इश्क़: दिल से निकली दस आवाज़ें
इश्क़ वो नशा है, जो हर मर्ज़ की दवा है,
बस एक नज़र तेरी, और दिल लापता है।
तेरी चाहत में, हम खुद को भुला बैठे,
इश्क़ की गलियों में, हर हद मिटा बैठे।
इश्क़ की आग में जलकर, हम खाक हुए,
फिर उसी राख से, नए ख्वाब हुए।
वो कहते हैं, इश्क़ इबादत है, मैंने माना,
तेरी सूरत में ही पाया, अपना खुदा माना।
इश्क़ ने सिखाया हमें जीना और मरना,
हर पल तेरे इंतज़ार में आहें भरना।
मेरी रूह में बस गया है तेरा इश्क़,
हर साँस लेती है, अब तेरा ही ज़िक्र।
इश्क़ वो तूफ़ान है, जो दिल को हिला दे,
कभी आसमाँ बना दे, कभी खाक मिला दे।
कहाँ से लाऊँ वो लफ्ज़, जो तेरा इश्क़ बयां कर सकें,
मेरी खामोशी में ही, सारे जज़्बात मचल सकें।
इश्क़ की गलियों में भटकते रहे उमर भर,
मिली जो मंज़िल, तो देखा, वो भी थी तेरी डगर।
खुदा करे, हर दिल को हो ऐसा इश्क़ नसीब,
जो रूह को रोशन कर दे, हर गम हो करीब।


