Zaalim (ज़ालिम)
ज़ालिम की दुनिया: दर्द, मोहब्बत और इंतज़ार ज़ालिम इश्क़ के अफ़साने तेरी बेरुखी ने हमें इतना बेबस कर दिया, कि हर सांस में तेरा ज़ालिम नाम लेते रहे। कब तक सहें हम ये ज़ालिम दुनिया के सितम, एक तेरी मोहब्बत ही थी, वो भी बेवफ़ा निकली। उसकी आँखों में ज़ालिम सा नशा था ऐसा, कि होश खो बैठे और खुद को लुटा बैठे। मौसम बदल गए, पर तेरा लहजा वही रहा ज़ालिम , हम आज भी तेरे इंतजार में बैठे हैं, वहीं के वहीं। हर रात चाँद से कहते हैं हम अपनी दास्ताँ, कैसे एक ज़ालिम ने हमारी दुनिया उजाड़ दी। तेरे इश्क़ में हमने क्या-क्या न सहा ज़ालिम , खुद को मिटा दिया तेरी हर खुशी के लिए। अब तो आदत सी हो गई है इन ज़ख्मों की, तेरा हर वार ज़ालिम अब मुस्कुरा कर सहते हैं। हमने सोचा था तू बदलेगा एक दिन, पर तू तो और भी ज़ालिम होता गया। ये कैसी मोहब्बत है...