Shikwa (शिकवा)
शिकवा (Shikwa) - दिल की आवाज़ और ख़ामोश गुज़ारिशें मुझे तुमसे कोई शिकवा नहीं, बस इतना है, तुमने क्यों बदल दी अपनी राहें यूँ ही तन्हा। लबों पर शिकवा लिए फिरता हूँ मैं, कि दिल को राहत क्यों नहीं मिलती तुझ बिन। हर बात पर शिकवा करना क्या ठीक है, कभी अपनी गलतियाँ भी तो देख, ऐ दोस्त! उनकी बेरुखी से शिकवा क्या करें हम, हम ही थे जो बेखबर उनकी अदाओं से। रात भर जागकर चाँद से शिकवा किया, क्यों मेरी तन्हाई का साथी तू भी नहीं रहा। मेरे हर शिकवा का जवाब तुम हो, पर तुमसे ही शिकवा कैसे करूँ मैं? ...