Marham (मरहम)

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मरहम (Marham): घावों पर प्यार की तासीर

शायरी 1

ज़ख्म गहरे थे बहुत, दर्द भी था बेशुमार,
तेरी मोहब्बत मिली, बन गई मेरा Marham (मरहम) यार।

शायरी 2

टूटे हुए दिल को बस तेरी याद ही सहलाती है,
हर दर्द का जैसे तू ही तो Marham (मरहम) बन जाती है।

शायरी 3

लफ्ज़ नहीं मिलते, दर्द बयां कैसे करें,
तेरी चुप्पी ही मेरे ज़ख्मों का Marham (मरहम) बन गई।

शायरी 4

इश्क़ में जो चोट लगी, उसका निशां गहरा था,
फिर तेरी एक झलक ही मेरा Marham (मरहम) ठहरा था।

शायरी 5

दुनिया के सारे गम एक तरफ रख दो,
तेरी हंसी ही मेरा सबसे बड़ा Marham (मरहम) है सुनो।

शायरी 6

अंधेरों में रोशनी की किरण जैसी हो तुम,
हर उदासी का मेरे लिए Marham (मरहम) हो तुम।

शायरी 7

कुछ रिश्ते ज़ख्म देते हैं, कुछ Marham (मरहम) बन जाते हैं,
तुम वो हो जो हर दर्द को आहिस्ता से मिटाते हैं।

शायरी 8

तेरी बातों में वो जादू है, जो दिल को सुकून दे,
हर परेशानी का वो एक मीठा सा Marham (मरहम) दे।

शायरी 9

वक्त के साथ हर ज़ख्म भर जाता है कहते हैं,
मगर कुछ ज़ख्मों का तो तेरा प्यार ही Marham (मरहम) होता है।

शायरी 10

जब भी दिल उदास होता है, तुम्हें याद करते हैं,
तेरी यादें ही तो हैं, जो मेरे लिए Marham (मरहम) का काम करती हैं।

शायरी 11

तेरे बिना हर खुशी अधूरी सी लगती है,
तेरी मौजूदगी ही मेरे हर गम का Marham (मरहम) है।

शायरी 12

इतना दर्द मिला है ज़िंदगी की राहों में,
तेरा हाथ थामना ही बन गया मेरा Marham (मरहम) पनाहों में।

शायरी 13

ज़ख्म चाहे जितना भी गहरा हो,
तेरा प्यार उस पर सबसे बड़ा Marham (मरहम) है।

शायरी 14

अश्कों को पोंछती है तेरी हर बात, हर मुस्कान,
तू ही तो है मेरी ज़िंदगी का सच्चा Marham (मरहम) और अरमान।

शायरी 15

दर्द की इंतहा में भी सुकून मिल जाता है,
जब तेरा साथ होता है, हर घाव पर Marham (मरहम) लग जाता है।

शायरी 16

कुछ बातें अनकही, कुछ ज़ख्म बेज़ुबान,
तेरी आँखों में देखा तो मिला हर दर्द का Marham (मरहम)।

शायरी 17

वो कहते हैं दिल पर लगी चोट कभी भरती नहीं,
पर तेरा साथ हो तो हर चोट Marham (मरहम) सी लगती है।

शायरी 18

तेरी आवाज़, तेरी हंसी, सब कुछ प्यारा है,
मेरे बिखरे दिल का तू ही तो Marham (मरहम) सहारा है।

शायरी 19

नज़रें मिलीं तुमसे तो दिल को करार आया,
बरसों के ज़ख्मों पर जैसे कोई Marham (मरहम) लगाया।

शायरी 20

खुदा से मांगा था, कोई हमदर्द मिले,
तुम मिलीं तो लगा हर दर्द का Marham (मरहम) मिल गया।

शायरी 21

रूह के ज़ख्मों को कौन समझता है यहाँ,
तेरे प्यार की खुशबू ही मेरा Marham (मरहम) है जान-ए-जाँ।

शायरी 22

दुनिया की भीड़ में खुद को खो दिया था कहीं,
तेरी बाहों में मिला सुकून, मेरा सबसे बड़ा Marham (मरहम) वहीं।

शायरी 23

हर आस टूटी थी, उम्मीदें बिखर गई थीं,
तेरी एक आवाज़ ही मेरे ज़ख्मों का Marham (मरहम) कर गई थी।

शायरी 24

ये दुनिया पत्थर दिल है, यहाँ कोई हमदर्द नहीं,
सिवाय तेरे प्यार के, जो मेरे लिए Marham (मरहम) से कम नहीं।

शायरी 25

इश्क़ में मिली हर चोट को चुपचाप सहते रहे,
तेरी एक मुस्कान को ही हम Marham (मरहम) कहते रहे।