हुस्न-ए-गैसूर: एक काव्यात्मक सफर
केसुलों की मदहोश कर देने वाली खूबसूरती पर 30 से अधिक शायरियां
तेरी ज़ुल्फ़ों की घटा जब भी लहराती है,
दिल में मेरे एक तूफानी सी हलचल मचाती है, ऐ मेरे **गैसूर**।
रुख पर जो बिखरे हैं तेरे काले **गैसूर**,
देखकर उन्हें हर दिल हो गया मजबूर।
शब-ए-हिज्र में याद आते हैं तेरे **गैसूर**,
दिल की तन्हाई में बन जाते हैं वो नूर।
हवा से खेलती जब तेरी लटें आती हैं,
खुशबू बिखेरकर दिल को मेरे महकाती हैं, ये तेरे **गैसूर**।
इन **गैसूर** की कसम, हमने वफा की है,
हर सांस तेरी यादों से हमने भरी है।
अदा से जब तू अपने **गैसूर** संवारती है,
कायनात की हर शय तुझपे वारी जाती है।
जैसे बादल घने छाए हों घटा बनकर,
वैसे ही तेरा **गैसूर** है छाया मेरे दिल पर।
तेरी **गैसूर** की छाँव में सुकून मिलता है,
इस दुनिया के हर गम से दिल को राहत मिलती है।
पलकें झुकीं, और बिखर गए **गैसूर** तेरे,
लुट गए हम, और बस हो गए तेरे।
रेशम से भी नरम हैं ये तेरे **गैसूर**,
छूकर इन्हें दिल होता है चूर-चूर।
जब भी तू अपनी लटों को झटकती है,
कयामत सी एक अदा सब पर बरसती है।
तेरी ज़ुल्फ़ों की ज़ंजीर में हम कैद हुए,
इस कैद से रिहाई की ना कोई ख्वाहिश हुई, तेरे **गैसूर**।
ये बल खाती लटें, ये तेरे **गैसूर** गहरे,
इन्हीं में उलझ कर हम खो गए हैं तेरे।
शबनमी बूंदों सी चमक है तेरे **गैसूर** में,
हर बूंद में एक नशा है, एक सुकून है।
छिप जाते हैं चाँद तारे तेरे **गैसूर** में,
जब तू रात को अपनी लटें खोलती है खुले में।
काले नाग सी बल खाती हैं तेरी लटें,
इनकी छाया में हम खो जाते हैं, तेरे **गैसूर**।
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में हम जन्नत देखते हैं,
हर धड़कन में बस तुझे ही सोचते हैं, तेरे **गैसूर** को।
जब तू अपनी ज़ुल्फ़ों को आज़ाद करती है,
सारा आलम तेरी खूबसूरती पर मरता है, तेरी **गैसूर** पर।
इन **गैसूर** के साए में हम दुनिया भूल जाते हैं,
हर पल तेरी याद में डूबे रहते हैं।
तेरे **गैसूर** का हर पेच एक कहानी कहता है,
दिल मेरा हर कहानी को सुनता रहता है।
घटा बनकर छाए हैं तेरे **गैसूर** गाल