Chashm (चश्म)
चश्म: इश्क की ज़ुबान तुम्हारी चश्म (चश्म) का हर नज़ारा, मेरे दिल में उतर जाता है, हर बार जब तुम मुस्कुराती हो, मेरा हर गम बिखर जाता है। इन गहरी चश्म (चश्म) में छुपा है एक समंदर गहरा, मैं डूबना चाहता हूँ इसमें, पाकर तुम्हारा चेहरा। जब से देखा है तुम्हारी चश्म (चश्म) का नूर, हर शय बेनूर लगती है, हर शय बेकसूर। तेरी चश्म (चश्म) -ए-मयगूं का हर इशारा, दीवाना बना देता है, कौन कहता है शराब ज़रूरी है, जब ये जाम पिला देता है। वो चश्म (चश्म) -ए-हया जो झुकती है, कमाल कर जाती है, हज़ार बातें बिन बोले, वो बयान कर जाती है। फ़लक भी हैरान है, चाँद भी परेशान है, जब से देखा है तेरी चश्म (चश्म) में मेरा जहान है। मेरी हर सुबह, मेरी ह...