Hoor (हूर)
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हूर (Hoor) पर दिलकश शायरी का संग्रह
शायरी 1
वो चाल नहीं, वो तो क़यामत की अदा है,
हर नज़र कह रही, वो जन्नत की हूर है।
शायरी 2
तेरी आँखों में डूबकर देखा है मैंने,
क्या ज़मीन पर कोई ऐसी भी हूर होती है।
शायरी 3
चाँद भी शर्मिंदा हो जाए तेरे हुस्न से,
ऐसी हूर देखी न किसी ने, न देखी जाएगी।
शायरी 4
इतनी ख़ूबसूरती कहाँ से लाई हो तुम,
क्या जन्नत से उतरी कोई हूर हो तुम?
शायरी 5
नज़र उठा कर देखा, तो क़ायनात रुक गई,
उसकी सूरत में दिखी, एक अनमोल हूर।
शायरी 6
कदमों में जिसके जन्नत बिछी हो,
क्या वो इंसान नहीं, कोई हूर है।
शायरी 7
ख़ुदा ने फुर्सत में तराशा होगा तुझे,
वरना कैसे दिखती कोई ऐसी हूर मुझे।
शायरी 8
तेरी ज़ुल्फ़ों में चाँदनी की शब है,
और नज़रों में बसी कोई हूर की ख़्वाहिश।
शायरी 9
दिल की हर धड़कन में तेरा नाम है,
क्या तुम मेरी हूर, मेरा आराम हो?
शायरी 10
ज़मीं पर आके भी ज़मीन की न हुई,
यकीनन वो किसी फ़िरदौस की हूर थी।
शायरी 11
तेरे रूप की चमक से जलते हैं आफ़ताब,
क्या ज़मीन पर कोई ऐसी हूर कभी देखी?
शायरी 12
तेरी हर अदा में इक नशा सा है,
लगता है तू कोई जन्नत की हूर है।
शायरी 13
ख़्वाबों में भी इतना हसीन मंज़र न था,
जैसा मेरी आँखों ने तेरी हूर को देखा।
शायरी 14
जो देख ले तुझे, वो दुनिया भूल जाए,
क्या पता तू कौन सी जहाँ की हूर है।
शायरी 15
तेरी हंसी में फूलों की ख़ुशबू है,
तेरी हर बात में हूर का जादू है।
शायरी 16
ज़ुल्फ़ें लहराएं तो घटा छा जाए,
आँखें झुकाए तो हूर नज़र आए।
शायरी 17
तेरे नूर से रोशन है महफ़िल सारी,
लगता है तू किसी हूर की सवारी।
शायरी 18
तेरा हर अंदाज़, एक अफ़साना है,
लगता है तू मेरी
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