Rukhsaar (रुख़सार)
नूर-ए-रुख़सार पर शायरी तेरी रुख़सार की लाली, हर सुबह का पैगाम है, देखूँ जब भी इसे, दिल को मिलता आराम है। शब की ज़ुल्मत में, चाँदनी सी तेरी रुख़सार , नूर-ए-मोहब्बत है, मेरी हर साँस का करार। वो हल्की सी मुस्कान, और उस पर तेरी रुख़सार , जैसे खुल गया हो जन्नत का कोई नया द्वार। तेरे रुख़सार पर बिखरी जुल्फ़ों की घटाएँ, सावन की पहली बारिश सी, मदहोश कर जाएँ। कागज़ पर उतारूँ क्या तेरी रुख़सार का नज़ारा, हर लफ्ज़ में सिमट जाए, यह है तेरा सहारा। जब जब पलकें झुकें, उभरती है तेरी रुख़सार , इक ख़ूबसूरत हकीकत, नहीं कोई ख़्वाब-ओ-दीदार। सूरज भी शर्मा जाए, देख तेरी रुख़सार का नूर, ऐसा जलवा कहीं देखा नहीं, हर ऐब से दूर। तेरी रुख़सार की मासूमियत, दिल को छू जाती है, हर गम, हर उदासी, पल भर में मिटा जाती है। हवा जब छू के गुज़रे, तेरी रुख़सार ...