ज़ुल्फ़: काली घटा सी, रेशम सी
मोहब्बत और ज़ुल्फ़ों का गहरा रिश्ता
चेहरे पे मेरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन,
क्या रोज़ गरजते हो, बरस जाओ किसी दिन।
तेरी ज़ुल्फ़ों की छांव में दिल आराम पाता है,
हर लहराती लट पे दिल मेरा फिसल जाता है।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक।
सोचा था हम ने आज सँवारेंगे वक़्त को,
अब हाथ में है ज़ुल्फ़, तो फिर ज़ुल्फ़ ही सही।
तेरी ज़ुल्फ़ें बिखर जाएं तो आफत लगती हैं,
और बांध ले तो कयामत लगती हैं।
किसने भीगे हुए बालों से ये छटका पानी,
झूम के आयी घटा टूट के बरसा पानी।
अपने सर इक बला तो लेनी थी,
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है।
दुनिया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर नहीं है,
कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है।
हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए,
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।
तेरी ज़ुल्फ़ों का हो यूं मिलकर सनम तुमसे,
रोने को जी चाहता है, तेरी ज़ुल्फ़ों के साए में सोने को जी चाहता है।
मुलायम हाथ, खम-ए-ज़ुल्फ़, अदा-ए-नैन और होंठ,
क़त्ल बाक़ी है, औज़ार तो सब पूरे हैं।
ऐ जुनूँ फिर मिरे सर पर वही शामत आई,
फिर फँसा ज़ुल्फ़ों में दिल फिर वही आफ़त आई।
तेरी ज़ुल्फ़ों की खुशबू ने हमें पागल कर दिया,
अब तो हर घड़ी बस तेरा इंतज़ार रहता है।
रुख़-ए-ताबाँ तो हुआ जाँ का ख़्वाहान पैदा,
दिल फँसाने को हुई ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ पैदा।
तेरी ज़ुल्फ़ भी सावन की घटा जैसी हैं,
बरसें ना बरसें, मगर दिल भीग जाता है।
घनी ज़ुल्फ़ों के साए में चमकता चाँद सा चेहरा,
तुझे देखूँ तो कुछ रातें सुहानी याद आती हैं।
माथे को चूम लूँ मैं ज़ुल्फ़ें बिखर ना जाएं,
इन लम्हों के इंतज़ार में ज़िंदगी ना गुज़र जाए।
तेरी खुली खुली सी ज़ुल्फ़ें इन्हें लाख तुम सँवारो,
इन्हें हम सँवारते तो कुछ और बात होती।
ज़ुल्फ़ों को दिया है रुख-ए-ज़ेबा ने अजब रंग,
जल्वों से तेरे और भी रौशन हुए साए।
मुखालिफ़ बाद-ए-सरसर में ज़रा लहराने दो ज़ुल्फ़ें,
इसी में हम वतन का अपने परचम देख लेते हैं।
निगाह से आसमान को देखना भी क्या ज़रूरी है,
तेरी ज़ुल्फ़ों में जानम कहकशां हम देख लेते हैं।
जम्अ' हुए रात की ख़ामोशी में यार सब,
कोई रो कर तो कोई ज़ुल्फ़ बना कर आया।
तेरी ज़ुल्फ़ों के अंधियारे में अपना शहर भूल आया मैं,
मैं वही शख्स हूँ जो तेरे दिल में अपना घर भूल आया।
हम ख़ाक तेरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ सँवारते,
हम से तो अपना हाल भी अच्छा नहीं हुआ।
ज़ाहिद ने मेरा हासिल-ए-ईमान नहीं देखा,
रुख़ पर तेरी ज़ुल्फ़ों को परेशां नहीं देखा।
ज़ुल्फ़ों की तो फितरत है लेकिन मेरे प्यारे,
ज़ुल्फ़ों से भी ज़्यादा बलखाए चलो हो।
तेरी ज़ुल्फ़ क्या सँवारी मेरी किस्मत निखर गई,
उलझनें तमाम मेरी दौलत में संवर गई।
तेरी ज़ुल्फ़ें जब हवा से उड़ती हैं,
कसम से दिल दीवाना हो जाता है।
वो राही हूँ पलभर के लिए, जो ज़ुल्फ़ के साए में ठहरा,
अब ले के चल दूर कहीं, ऐ इश्क़ मेरे बेदाग मुझे।
तेरी ज़ुल्फ़ों के साए में जीने का मज़ा कुछ और है,
तेरे बालों की खुशबू में बहने का नशा कुछ और है।
शब का मानज़र भी कयामत का हसीं है,
है तकिया कहीं, ज़ुल्फ़ कहीं, खुद वो कहीं हैं।
रुख़-ए-यार पे ये ज़ुल्फ़ें यूँ फिसल रही हैं,
कभी दिन निकल रहा है, कभी रात ढल रही है।
बेमौत हमको हुस्न से मारा ना कीजिए,
सरेआम यूं ज़ुल्फ़ सवारा न कीजिए।
बिजली ने सीख ली उनके तबस्सुम की अदा,
रंग ज़ुल्फ़ों की चुरा लाई है बरसात की घटा।
तेरा चेहरा चूम लेते हैं तुमने भी जालिम,
ज़ुल्फ़ों को सर पे चढ़ा रखा है।
ज़ुल्फ़ों से यूँ चेहरे को छुपाते क्यों हो,
शर्माते हो तो सामने आते क्यों हो।
छेड़ी है कभी लब को कभी रुखसारों को तुमने,
ज़ुल्फ़ों को बहुत सर पर चढ़ा रखा।
रंज खुशी में बदल कर देख लो,
ज़ुल्फ़ यार में थोड़ा उलझ कर देख लो।
तेरी ज़ुल्फ़ों का साया जो चेहरे पे गिरता है,
दिल नहीं अब तो रुख तक महकता है।
तराशा है उनको बड़ी फुर्सत से,
ज़ुल्फ़ें जो उनकी बादल की याद दिला दे।
रात ढली, सुब्ह का मंजर भी क़यामत का हसीं है,
ज़ुल्फ़ कहीं, तकिया कहीं, और वो कहीं है।