Naasoor (नासूर)
नासूर: दर्द जो गहराता रहे शायरी 1 दिल में छुपा दर्द अब गहरा गया है, बनकर एक नासूर मुझे सता गया है। शायरी 2 यादों का ये ज़हर, हर पल बढ़ता जा रहा है, रूह का नासूर बनकर, जान ले रहा है। शायरी 3 ज़ख्मों पे नमक छिड़कते रहे लोग, और ये दर्द बन गया रूह का नासूर एक रोग। शायरी 4 भूले नहीं वो वादे, जो तुमने किए थे, हर एक वादा, एक नासूर बन गया है। शायरी 5 कहाँ तक सहें ये सितम ज़िंदगी के, हर साँस में बसता है एक नासूर । शायरी 6 रिश्तों की डोर यूँ उलझी पड़ी है, ...