Bezaar (बेज़ार)
बेज़ार (Bezaar) शायरी संग्रह
शायरी 1
ज़िन्दगी के इस सफर से, अब मैं बड़ा बेज़ार हूँ,
ढूंढता हूँ सुकून जहाँ, हर पल इंतेज़ार हूँ।
शायरी 2
तेरी बेरुखी ने किया है, मुझको इतना बेज़ार,
अब तो अपने ही साये से भी, नहीं है मुझको प्यार।
शायरी 3
इश्क़ की राहें थीं कभी हसीं, अब मैं हूँ उनसे बेज़ार,
हर मोड़ पर मिली है ठोकर, अब नहीं है कोई करार।
शायरी 4
ये दुनिया की रस्मों से, दिल अब है मेरा बेज़ार,
हर चेहरे पर नक़ाब है, अब नहीं कोई एतबार।
शायरी 5
ख़ामोशी से सुनता हूँ अब, हर बात को मैं बेज़ार,
गहरे हैं कुछ ज़ख्म ऐसे, जिनसे नहीं है इंक़ार।
शायरी 6
रात की तन्हाईयों से, दिल हो गया है बेज़ार,
चाँद भी नहीं देता अब, पहले सा कोई प्यार।
शायरी 7
हर बात पर अब करता हूँ, मैं सिर्फ़ तकरार,
शायद इस दिल का भी है, तुमसे कुछ बेज़ार।
शायरी 8
ख़ुशियों के हर रंग से, मैं हो चला हूँ बेज़ार,
ग़म की काली चादर में, है मेरा हर इज़हार।
शायरी 9
उन पुराने वादों से, क्यों दिल है इतना बेज़ार?
क्या टूट गया वो सपना, जिसका था मुझे इंतज़ार?
शायरी 10
हर एक लम्हा, हर एक पल, मुझको करता है बेज़ार,
कैसी है ये ज़िन्दगी, कैसी है ये पुकार।
शायरी 11
ज़िन्दगी के इस मेले में, अब नहीं कोई साथी,
हर रिश्ते से मेरा दिल, हो गया है बेज़ार।
शायरी 12
ख़्वाबों की दुनिया से भी, दिल अब है मेरा बेज़ार,
हक़ीक़त की ज़मीं पर, हर तरफ है अंधकार।
शायरी 13
महफिलों का शोर भी अब, मुझको लगता है बेज़ार,
तन्हाई में ही मिलती है, थोड़ी सी मुझे क़रार।
शायरी 14
हर झूठी मुस्कान से, दिल हो गया है बेज़ार,
सच्चाई की तलाश में, मैं दर-बदर फिरता हर बार।
शायरी 15
वादों की धूप में भी, अब मैं हूँ बेज़ार,
कोई साया नहीं मिलता, हर तरफ है रेगज़ार।
शायरी 16
मोहब्बत के हर नाम से, दिल अब है इतना बेज़ार,
नफ़रत की आग में जल रहा, हर मेरा संसार।
शायरी 17
खुदा जाने क्यों इतनी, है ये दुनिया बेज़ार,
हर शख्स अकेला है, हर दिल में है दर्द-ओ-क़रार।
शायरी 18
इन अधूरी कहानियों से, मैं हो गया हूँ बेज़ार,
कोई अंत नहीं दिखता, बस लम्हा-लम्हा है बेकार।
शायरी 19
अपने ही अक्स से भी, अब मैं हूँ बहुत बेज़ार,
नज़र आता है उसमें भी, एक टूटा हुआ संसार।
शायरी 20
वफ़ा की बातें सुनकर, दिल मेरा है बेज़ार,
यहाँ हर कोई बेवफ़ा है, किसका करूँ एतबार।
शायरी 21
रौशनी से भी आँखें मेरी, अब होती हैं बेज़ार,
अंधेरों में ही शायद, मिलेगा कुछ साफ़ करार।
शायरी 22
इस शोर-ओ-गुल से दुनिया के, हो गया हूँ बेज़ार,
ख़ामोशी की राहों में, तलाशता हूँ अपना प्यार।
शायरी 23
किसी और की ख़ुशी से भी, मैं अब हूँ बेज़ार,
क्या करूँ, मेरे हिस्से में है, बस ग़म का कारोबार।
शायरी 24
हर नई सुबह से भी, मन मेरा है बेज़ार,
पुरानी शामों में ही अक्सर, मैं ढूँढता हूँ ख़ुशगवार।
शायरी 25
इन रस्मों और रिवाजों से, दिल मेरा है बेज़ार,
आज़ादी की तलाश में, मैं हूँ एक ख़ुददार।