Khaali (ख़ाली)
ख़ालीपन की गहराइयाँ: Khaali (ख़ाली) पर विशेष शायरी संग्रह
दिल की हर आरज़ू अब ख़ाली रह गई है,
ज़िंदगी भी जैसे एक पहेली रह गई है।
ज़िंदगी भी जैसे एक पहेली रह गई है।
तेरी यादों से मेरा दामन ख़ाली नहीं,
बस तेरी मौजूदगी की कमी अब भी सताती है।
बस तेरी मौजूदगी की कमी अब भी सताती है।
जब से तुम गए हो, ये घर ख़ाली सा लगता है,
हर कोने में बस तेरी कमी का एहसास रहता है।
हर कोने में बस तेरी कमी का एहसास रहता है।
पन्नों पर लिखे हर लफ़्ज़ ख़ाली से लगे,
तेरी दास्ताँ के बिना सारे क़िस्से अधूर से रहे।
तेरी दास्ताँ के बिना सारे क़िस्से अधूर से रहे।
हाथों की लकीरें भी अब ख़ाली सी हैं,
क़िस्मत ने भी जैसे साथ छोड़ दिया है।
क़िस्मत ने भी जैसे साथ छोड़ दिया है।
कभी सोचे न थे ये पल भी आएँगे,
जब दिल के हर कोने ख़ाली से रह जाएँगे।
जब दिल के हर कोने ख़ाली से रह जाएँगे।
नज़रों में है इंतज़ार, मगर पलकें ख़ाली हैं,
अश्कों की बारिश भी अब सूखी सी लगती है।
अश्कों की बारिश भी अब सूखी सी लगती है।
ये दुनिया की महफ़िल भी अब ख़ाली लगती है,
तेरे बिना हर खुशी अब अधूरी सी लगती है।
तेरे बिना हर खुशी अब अधूरी सी लगती है।
दुआओं में भी अब वो असर नहीं रहा,
हर मन्नत का दामन ख़ाली सा लगता है।
हर मन्नत का दामन ख़ाली सा लगता है।
रातें लंबी हैं, मगर चाँदनी ख़ाली है,
तारों की चमक भी अब फीकी सी लगती है।
तारों की चमक भी अब फीकी सी लगती है।
रिश्तों की डोर भी अब कमज़ोर हो गई,
हर वादे की गठरी अब ख़ाली सी रह गई।
हर वादे की गठरी अब ख़ाली सी रह गई।
ख़्वाबों का शहर भी अब वीरान हो गया,
हर गली, हर कूचा अब ख़ाली सा लगता है।
हर गली, हर कूचा अब ख़ाली सा लगता है।
तेरे बिना ज़िंदगी का हर लम्हा ख़ाली है,
साँसों की धुन भी अब बेसुरी सी लगती है।
साँसों की धुन भी अब बेसुरी सी लगती है।
महफ़िल में भी अब वो रौनक नहीं,
हर चेहरा ख़ाली सा, हर आँख बेनूर सी है।
हर चेहरा ख़ाली सा, हर आँख बेनूर सी है।
दिल के अश्कों में भी अब वो नमी नहीं,
हर दर्द का पैमाना अब ख़ाली सा लगता है।
हर दर्द का पैमाना अब ख़ाली सा लगता है।
सोचता हूँ अब किस राह पर चलूँ,
हर मंज़िल ख़ाली सी, हर सफ़र बेनाम सा।
हर मंज़िल ख़ाली सी, हर सफ़र बेनाम सा।
ये कैसी उदासी है जो छाई है मुझ पर,
हर खुशी का ख़ज़ाना अब ख़ाली सा लगता है।
हर खुशी का ख़ज़ाना अब ख़ाली सा लगता है।
हवाओं में भी अब वो ताज़गी नहीं,
हर साँस ख़ाली सी, हर पल बेजान सा।
हर साँस ख़ाली सी, हर पल बेजान सा।
तेरे इंतज़ार में हर घड़ी गुज़रती है,
मगर तेरा ठिकाना अब भी ख़ाली है।
मगर तेरा ठिकाना अब भी ख़ाली है।
ज़िंदगी का हर रंग फीका पड़ गया,
तेरे बिन ये कैनवास अब ख़ाली सा लगता है।
तेरे बिन ये कैनवास अब ख़ाली सा लगता है।
उम्मीदों के दिए बुझ गए हैं सभी,
हर रात अब ख़ाली सी, हर सवेरा बेनूर सा।
हर रात अब ख़ाली सी, हर सवेरा बेनूर सा।
मेरे दिल का आँगन ख़ाली पड़ा है,
तेरी यादों के फूल भी अब मुरझा गए हैं।
तेरी यादों के फूल भी अब मुरझा गए हैं।
हर आवाज़ में अब सन्नाटा गूँजता है,
ये शहर ख़ाली सा, हर गली वीरान सी।
ये शहर ख़ाली सा, हर गली वीरान सी।
न जाने किस मोड़ पर ले आई ये ज़िंदगी,
जहाँ हर दामन ख़ाली सा, हर चेहरा अंजान सा।
जहाँ हर दामन ख़ाली सा, हर चेहरा अंजान सा।