Na-umeedi (ना-उम्मीद)
ना-उम्मीदी (Na-umeedi): उम्मीदों के टूटने पर
हर राह में अब दिखती है बस ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद),
जीवन के हर मोड़ पर बस यही कहानी है।
जब से खोई है मंजिल की उम्मीद, हर तरफ,
छा गई है रूह पर गहरी ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) की चादर।
तारों भरी रात में भी अब कोई ख्वाब नहीं,
हर सुबह बस मिलती है हमको ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
दिल में अब नहीं कोई चाहत, कोई आस,
हर तरफ फैली है बस गहन ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
जो कभी रंगीन थे, अब बेरंग हैं वो दिन,
ले आई है ये ज़िन्दगी कैसी ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)!
हर पल एक नया इम्तिहान, हर पल एक नई हार,
बढ़ती जाती है मेरे अंदर ये ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हौसले पस्त हुए, इरादे भी डगमगाए हैं,
छा गई है मेरे मन पर अब ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
उम्मीदों का दिया बुझा तो अंधेरा छा गया,
रूह में समा गई गहरी ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
नज़रें तलाशती हैं रोशनी को बेबस होकर,
पर हर तरफ दिखती है बस ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
टूटे हुए ख्वाबों की किरचें बिखरी हैं हर सूँ,
हर टुकड़े में दिखती है एक ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
क्या कहें इस दिल से, क्या कहें इन आँखों से,
जब मिली है बस हमें यह ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हंसी रूठ गई, खुशी कहीं छिप गई है,
जिंदगी में भर गई है बस ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हर मंज़र पर एक अजीब सी खामोशी है,
मन को घेरे है एक गहन ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
अब कोई नया सपना बुनने की हिम्मत नहीं,
साथ छोड़ गई है हर आशा, हर ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) बन गई।
वक्त के थपेड़ों ने ऐसा दर्द दिया है,
के हर कोने में बैठी है अब ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
जो रंग बिखेरते थे कभी, वो फीके पड़ गए,
क्या करें, जब हर तरफ हो ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)?
तन्हा रातों में बस एक ही साया है,
मेरी हमदम अब तो है बस ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हर आह में, हर सिसकी में, एक दर्द है छुपा,
ये है असर मेरे अंदर की ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) का।
मुस्कुराहटें खो गईं कहीं भीड़ में,
आँखों में बस गई है ये ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
ख्वाबों के महल सब रेत से बने थे,
बिखेर गई उन्हें यह ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हर नई सुबह एक नया बोझ लाती है,
और भी गहरी होती जाती है ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
राहों में अंधेरा, दिल में उदासी का बसेरा,
क्या करें जब साथ हो ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) का घेरा?
कोई आस नहीं, कोई सहारा नहीं दिखता,
सिर्फ चारों तरफ फैली है ये ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
परिंदों की उड़ान में भी अब वो जोश नहीं,
हर सांस में मिली है हमको ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
रंगों की दुनिया में बस काला रंग दिखता है,
क्या करूं जब दिल पर छाई है ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हर सुबह एक नया सवाल छोड़ जाती है,
जवाब में बस मिलती है यह ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
अब न कोई खुशी है, न कोई गम का निशान,
बस एक ही साथी है अब ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
दिल के सूने आँगन में पत्तियां बिखरी हैं,
ये हैं अश्क मेरी ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) के।
हर राह पर बिछी है कांटों की चादर,
कौन कहे कि अब न हो ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) का असर?
सितारों की चमक भी अब नहीं भाती है,
जब से दिल में घर कर गई ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
लम्हे गुज़रते हैं, सदियाँ सी लगती हैं,
हर पल तड़पाती है यह ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
हर कदम पर ठोकर, हर कदम पर गम,
यह है मेरे जीवन की अब नई ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
आंसुओं की ज़ुबाँ में अब क्या सुनाऊं तुम्हें,
हर लफ्ज़ में बस गूंजती है ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)।
ख़ामोशी चीखती है दिल के हर कोने से,
यह है आवाज़ मेरी ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद) की।
कब तक मैं उम्मीद की चादर ओढ़ता रहूं,
जब हर तरफ फैली हो यह ना-उम्मीदी (ना-उम्मीद)?