Mayusi (मायूसी)
मायूसी (Mayusi): दिलों की गहराइयों से निकलीं 30 शायरियां
शायरी 1
ज़िंदगी की राहों में कभी-कभी ऐसा भी होता है,
हर तरफ छा जाती है गहरी सी मायूसी।
शायरी 2
हर खुशी से रूठ कर बैठी है मेरी तकदीर,
दिलों में घर कर गई है ये मायूसी की ज़ंजीर।
शायरी 3
उम्मीदों के दीपक बुझ से गए हैं सारे,
हर तरफ पसरी है अब बस मायूसी के नज़ारे।
शायरी 4
हँसते हुए चेहरे के पीछे, एक दर्द गहरा है,
ये मायूसी ही तो है, जिसने मुझको घेरा है।
शायरी 5
रात की तन्हाई में, अक्सर वो दस्तक देती है,
मेरी आँखों से टपकती हुई ये मायूसी।
शायरी 6
कोई वजह नहीं, फिर भी दिल उदास है,
शायद ये मायूसी ही अब मेरी हमराज़ है।
शायरी 7
हर खुशी के बाद एक गम का साया है,
इस दुनिया में बस मायूसी ही मेरा माया है।
शायरी 8
खो गए हैं रास्ते, मंज़िल भी दूर है,
दिल की हर धड़कन में बसी है मायूसी।
शायरी 9
तेरी यादों से भी अब वो चमक नहीं रही,
हर सुबह लाती है नई मायूसी।
शायरी 10
जो कभी हंसी थी, अब वो खामोश है,
मेरे दिल में बस गई है ये गहरी मायूसी।
शायरी 11
हर आस टूटने लगी है अब इस जहाँ में,
ज़िंदगी है या सिर्फ एक लंबी मायूसी।
शायरी 12
रंग भरे थे कभी ख्वाबों में मेरे भी,
आज बस है ये मायूसी, ये रंग फीके से।
शायरी 13
लफ्ज़ खामोश हैं, निगाहें भी अब सूनी हैं,
क्या बताऊँ, दिल में कितनी गहरी मायूसी है।
शायरी 14
ज़ख्म तो भर गए, पर निशान बाकी हैं,
हर सांस में आज भी वही मायूसी बाकी है।
शायरी 15
तारों भरी रातें भी अब काली लगती हैं,
क्या करूँ, जब हर तरफ मायूसी पनपती है।
शायरी 16
दिल में उम्मीद का एक क़तरा भी नहीं,
सिर्फ बिखरी पड़ी है अब ये मायूसी की ज़मीं।
शायरी 17
वक़्त ने कैसा ये सितम ढा दिया है,
हर लम्हे को मायूसी से सजा दिया है।
शायरी 18
रोशनी की तलाश में भटका मैं दर-ब-दर,
हर गली में मिली बस गहरी सी मायूसी।
शायरी 19
मुस्कान अधूरी है, ख्वाब भी अधूरे,
क्या यही है मेरा मुकद्दर, ये मायूसी के पूरे?
शायरी 20
गमों की चादर ओढ़ कर सोया है दिल,
और इस चादर के नीचे है बस मायूसी।
शायरी 21
हर आस टूटी, हर सपना बिखर गया,
मायूसी का साया अब हर तरफ ठहर गया।
शायरी 22
चेहरे पे हंसी लिए फिरते हैं सब लोग,
कोई देखे मेरे दिल की ये मायूसी, ये रोग।
शायरी 23
तन्हा रातों में जब यादें आती हैं,
संग अपने मायूसी को भी वो लाती हैं।
शायरी 24
ज़िंदगी की किताब में अब क्या बचा है,
हर पन्ने पर लिखी बस मायूसी की दास्ताँ है।
शायरी 25
हर ख़ुशी गुज़री ऐसे, जैसे कोई ख़्वाब था,
बचा है बस दिल में ये मायूसी का अज़ाब सा।
शायरी 26
चाहत में भी मिली अब तो सिर्फ रुसवाई,
मेरे हिस्से में आ गई है सारी मायूसी।