Zulmat (ज़ुल्मत)
ज़ुल्मत (Zulmat): रोशनी की तलाश में
शायरी 1
शहर की हर गली में है इक अजीब सी खामोशी,
घेर लेती है हर तरफ से ये ज़ुल्मत हमारी।
शायरी 2
आँखों में कैद है वो एक अधूरी ख्वाहिश,
कैसे मिटाऊँ दिल से ये ज़ुल्मत की बारिश।
शायरी 3
उम्मीद की एक किरण भी नज़र नहीं आती,
घनेरी रात में छाई है ये कैसी ज़ुल्मत।
शायरी 4
तेरे जाने से दिल में जो खालीपन आया,
उसकी परछाईं बन गई है ये ज़ुल्मत।
शायरी 5
सूरज की किरणें भी अब चुभने लगी हैं,
हर रोशनी में दिखती है मुझे ज़ुल्मत।
शायरी 6
दिल के कोने में छुपा है एक गहरा राज़,
उस राज़ की परछाईं है ये ज़ुल्मत।
शायरी 7
ज़िंदगी की राहों में मिलते हैं कई मोड़,
कहीं खुशियों की चमक, कहीं ज़ुल्मत का तोड़।
शायरी 8
रात की गहराई में तारे भी फीके पड़ गए,
जब से मेरी दुनिया पर छाई ये ज़ुल्मत।
शायरी 9
हर आहट पे लगता है वो आ रहा है,
मगर ये तो बस ज़ुल्मत का साया है।
शायरी 10
कैसे बताऊँ तुम्हें अपने दिल का हाल,
घिरी है हर तरफ से बस ज़ुल्मत की जाल।
शायरी 11
हर सुबह एक नई जंग है खुद से,
लड़ रहा हूँ मैं अपनी इस ज़ुल्मत से।
शायरी 12
चाँद की रोशनी भी अब चुभने लगी है,
दिल में जब से छाई है ये ज़ुल्मत।
शायरी 13
हर रात यही सोचता हूँ कि सुबह होगी,
पर ये ज़ुल्मत कहाँ मेरा पीछा छोड़ेगी।
शायरी 14
तन्हाई का आलम है और गहरा सन्नाटा,
ज़ुल्मत की चादर ओढ़े बैठा हूँ मैं अकेला।
शायरी 15
रूह पर छाई है एक उदासी की परत,
लगता है जैसे हर तरफ है ज़ुल्मत ही ज़ुल्मत।
शायरी 16
ख्वाबों में भी अब डर लगने लगा है,
हर ख्वाब में ये ज़ुल्मत का साया है।
शायरी 17
उजालों से कह दो, अब दूर ही रहें,
मेरी आँखों को भाने लगी है ये ज़ुल्मत।
शायरी 18
हर कदम पर मिलती है एक नई निराशा,
घेर लेती है मुझे ये ज़ुल्मत की भाषा।
शायरी 19
दिल के अंदर छुपा है एक अँधेरा कोना,
जहाँ बस रहती है ये मेरी ज़ुल्मत।
शायरी 20
वो दिन भी क्या दिन थे, जब रोशनी थी,
अब तो हर तरफ फैली है ये ज़ुल्मत।
शायरी 21
इश्क़ की राहों में भी कहाँ कम थी ये ज़ुल्मत,
हर मोड़ पर मिली है बस तन्हाई की आदत।
शायरी 22
आँखों में आँसू और दिल में दर्द की आग,
जला रही है मुझको ये ज़ुल्मत की लाग।
शायरी 23
कभी तो आएगी वो सुबह, जब दूर होगी,
ये मेरे जीवन से छाई हुई ज़ुल्मत।
शायरी 24
हर दुआ में माँगी है मैंने रोशनी,
शायद मिटा सके ये मेरी ज़ुल्मत।
शायरी 25
ये कैसा सफर है जहाँ कोई हमदम नहीं,
बस साथ है मेरे ये गहरी ज़ुल्मत।
शायरी 26
हर एक पल में महसूस करता हूँ उसे,
मेरी साँसों में बसी है ये ज़ुल्मत।