Parda (पर्दा)

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पर्दा (Parda) पर शायरी का खूबसूरत संग्रह

नज़र का, दिल का, या हकीकत का... हर **पर्दा** कुछ कहता है।

तेरी आँखों के पीछे का राज़ क्या है,
क्यों रखा है तुमने अपनी अदा पर **पर्दा** सा?

उठा दो अब ये चेहरे से नज़रों का **पर्दा**,
कि दीदार को बेचैन है ये दिल-ए-बर्बाद सा।

मोहब्बत में कहाँ होता है कोई **पर्दा**,
ये तो नज़रों का खेल है, नज़र से नज़र का।

वो चुपचाप से आते हैं और चले जाते हैं,
जाने कौन से **पर्दे** में छुपे रहते हैं।

इश्क़ की आग में जलकर भी वो महफूज़ रहे,
आँखों पर उनके हया का **पर्दा** था।

रूह से रूह का मिलना तो एक बहाना था,
असल में जिस्म के **पर्दों** को हटाना था।

हर ज़ुबाँ पर उनका नाम, हर नज़्म में उनका जिक्र,
फिर भी क्यों रखा है अपनी पहचान पर **पर्दा**?

झुकती पलकें, झुकी नज़रें, और वो हया का **पर्दा**,
हाय! तेरी हर अदा पर ये दिल फिदा रहता है।

क्या फायदा ऐसे हुस्न का जो गुमनाम रहे,
गर हटा न सके कभी अपने **पर्दे** को।

खामोशी भी एक **पर्दा** है गहरे राज़ों का,
कुछ बातें अनकही ही अच्छी लगती हैं।

कभी तो हटेंगे ये दुनिया के **पर्दे** सारे,
और सामने होगी हकीकत बेनकाब सी।

दिल के आईने पर धूल का **पर्दा** है,
कैसे देखूँ उसमें अपना अक्स भला?

नज़रें मिलती हैं, फिर झुक जाती हैं,
ये **पर्दा** भी कितना हसीं लगता है।

तेरे चेहरे से जब **पर्दा** हटा तो,
चाँद भी शर्म से बादलों में छुप गया।

हम तो तेरे इशारों पर जीते रहे,
तूने तो सदा रखा आँखों पर **पर्दा**।

ये जो **पर्दा** है तेरे मेरे दरमियाँ,
काश इक दिन ये हट जाए और मुलाकात हो जाए।

कहते हैं हया **पर्दा** है औरत का,
मगर हया तो हर इंसान की ज़ीनत है।

कितने राज़ दफन हैं इस **पर्दे** के पीछे,
हर निगाह की अपनी एक कहानी है।

क्या ज़रूरत है नक़ाब की तुम्हें,
जब अदाओं पर ही है **पर्दा** लगा हुआ।

ज़िंदगी ने कई बार गिराया है **पर्दा**,
हर बार एक नया सबक सिखाया है।

तेरी तस्वीर देखूँ या तेरी बातें सुनूँ,
तेरी हर अदा में है एक हसीं **पर्दा**।

जरा **पर्दा** हटाओ निगाहों से अपनी,
कि ये दुनिया बेकरार है तुम्हें देखने को।

जब से देखा है उनकी आँखों का **पर्दा**,
अपनी दुनिया से हमने मुँह मोड़ लिया है।

हर राज़ की अपनी एक कीमत होती है,
हर **पर्दा** एक कहानी छुपाता है।

मुश्किल है उन्हें समझना, जो हैं खामोश,
उनकी हर बात पर है **पर्दा** लिपटा हुआ।

ये कैसा **पर्दा** है जो उठने को नहीं,
सारी उम्र गुज़र गई तुम्हें देखने को।

कभी हकीकत को भी **पर्दा** चाहिए होता है,
कुछ बातें अनकही ही खूबसूरत लगती हैं।

इंतज़ार की हदें भी तोड़ दी हमने,
कब हटायेगा तू अपनी नज़र से **पर्दा**।

तेरी यादों का **पर्दा** गिरा रहता है,
इन आँखों से कोई और कैसे झाँके?

वो नज़रों से नज़रों का **पर्दा** हटाना,
वो पहला दीदार, वो पहली शरारत।

जब इश्क की महफिल सजती है,
तो हया का **पर्दा** उठ जाता है।

अंधेरों में ही अक्सर छुपी रहती हैं हकीकतें,
रोशनी में हर **पर्दा** उठ जाता है।

हसरतों का इक **पर्दा** है दरमियाँ,
वर्ना कहाँ दूर हैं वो हमसे।

इतना भी ना करो हुस्न का **पर्दा**,
कि चाहने वाले भी पहचानने से डरें।

नज़रबंदी का खेल है सारा ये जहाँ,
बस हर तरफ एक नया **पर्दा** है।

तेरी खुश्बू से महक जाती है रूह,
चाहे कितना भी रखा हो तुमने **पर्दा**।

इस जहाँ में हर शख्स है एक राज़,
हर दिल पर है एक गहरा **पर्दा**।

नज़रें मिलीं और दिल में हलचल हुई,
उठा गया था शायद थोड़ा सा **पर्दा**।

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