Qaza (क़ज़ा)
क़ज़ा पर बेहतरीन शायरी का संग्रह
शायरी 1
इश्क़ की राह में हर मोड़ पे मिलती है ज़ुदाई,
अपनी ही तक़दीर से लड़ता रहा, जब आई क़ज़ा.
शायरी 2
ज़िंदगी एक सफ़र है, और मौत है आख़िरी मुक़ाम,
क़ज़ा जब भी आएगी, हँस कर करेंगे सलाम.
शायरी 3
हर साँस तेरी अमानत है, हर लम्हा तेरा फ़ुर्मान,
कब आएगी क़ज़ा, बस यही सोचता है इंसान.
शायरी 4
उम्र भर की कमाई, पल भर में लुटा दी,
तेरी एक निगाह से, मेरी क़ज़ा भी सज़ा दी.
शायरी 5
क्या फ़र्क पड़ता है, जी कर या मर कर,
जब क़ज़ा ही लिखी हो, तेरी याद में मर कर.
शायरी 6
ज़िंदगी की उलझनें, सुलझती ही नहीं,
कब आएगी वो घड़ी, जब आए क़ज़ा कहीं.
शायरी 7
ना कोई आसरा, ना कोई ठिकाना है,
हर पल तेरी क़ज़ा का इंतज़ार पुराना है.
शायरी 8
हर दर्द में मिली राहत, हर ग़म में मिली फ़ना,
लेकिन तेरी जुदाई, बन गई मेरी क़ज़ा.
शायरी 9
जब तेरी याद आती है, तो दिल सहम जाता है,
क्या पता कब मेरी रूह, क़ज़ा को पुकारता है.
शायरी 10
ये दुनिया है फ़ानी, हर शय को ज़वाल है,
आज नहीं तो कल, आनी है क़ज़ा, ये सवाल है.
शायरी 11
मौत से कहाँ डर लगता है मुझे,
डर तो इस बात का है, कि क़ज़ा भी बेवफ़ा निकली.
शायरी 12
कितनी अजीब है ये ज़िंदगी की दास्ताँ,
इंतज़ार क़ज़ा का, और हर पल का अरमान.
शायरी 13
तेरी जुल्फों की छाँव में, कट जाए मेरी उमर,
और जब आए क़ज़ा, तो हो तेरा ही नाम लब पर.
शायरी 14
सजा-ए-मौत भी मंज़ूर, अगर तू मुस्कुरा दे,
तेरी एक हँसी के लिए, सौ बार आए क़ज़ा.
शायरी 15
मोहब्बत की राह में, हर मोड़ पे तू साथ था,
पर जब क़ज़ा आई, तो तेरा हाथ छोड़ना पड़ा.
शायरी 16
उदासियों का आलम है, न जाने क्या होगा,
तेरी याद में ही अब तो, मेरी क़ज़ा होगी.
शायरी 17
इश्क़ में इतना तबाह हुए, कि अब क्या बताएँ,
हर रात ये दुआ है, कि सुबह तक क़ज़ा आ जाए.
शायरी 18
ज़िंदगी की हक़ीक़त, मौत में छुपी है,
क़ज़ा से बढ़कर कोई, हसीन चीज़ नहीं है.
शायरी 19
जो आया है इस जहाँ में, उसे जाना तो होगा,
क़ज़ा से भला कोई, कैसे मुंह मोड़ेगा.
शायरी 20
तेरी यादों के साये में, दिन गुज़रता है मेरा,
काश क़ज़ा भी ऐसी आए, जो मुझे तुझसे मिला दे.
शायरी 21
हर पल, हर घड़ी, बस तेरी ही जुस्तजू है,
जाने कब ये ज़िंदगी, क़ज़ा को छू लेगी.
शायरी 22
ग़मों की धूप में, जला हूँ उम्र भर,
अब क़ज़ा ही मेरी, आखिरी हमसफ़र.
शायरी 23
क्या पता किस मोड़ पर, ज़िंदगी दगा दे जाए,
क़ज़ा तो एक दिन आनी है, बस वक़्त का इंतज़ार है.
शायरी 24
हर ख्वाब अधूरा रह गया, हर आरज़ू बेमानी,
सिर्फ़ क़ज़ा ही है, जो आएगी बड़ी मेहरबानी.
शायरी 25
दुनिया की चमक-दमक, सब कुछ झूठा है यार,
सिर्फ़ क़ज़ा ही सच्ची है, करती है बेड़ा पार.