Janaza (जनाज़ा)

hindi shayari, हिंदी शायरी, Janaza (जनाज़ा)

जनाज़ा (Janaza) पर दिल छू लेने वाली शायरी

शायरी 1

जब उठा मेरा जनाज़ा, सबने कहा रोना नहीं,
कोई पूछे उससे, जिसने खोया सब कुछ, जीना नहीं।

शायरी 2

मेरी मौत पर सब हैरान थे, मेरा जनाज़ा देखकर,
ज़िन्दगी भर जो खामोश रहा, वो आज बोल पड़ा।

शायरी 3

आज उसके दिल में भी मेरा ख़्याल आएगा,
जब मेरा जनाज़ा उसकी गली से गुज़र जाएगा।

शायरी 4

बड़ी ख़ामोशी से निकला मेरा जनाज़ा यार,
कोई आंसू ना बहा, कोई आहट ना सुनी।

शायरी 5

शायद अब उसे मेरी याद आए, मेरी क़द्र हो,
जब मेरा जनाज़ा उसके घर के सामने से गुज़रे।

शायरी 6

उदासियाँ लेकर निकला मेरा जनाज़ा, क्या खूब मंज़र था,
शहर में हर चेहरे पर खुशी का नक़ाब था।

शायरी 7

वो आए तो थे मेरे जनाज़े पर, मगर चेहरा छुपाकर,
डर था कहीं उनकी आँखें भीग ना जाएँ।

शायरी 8

रुक जाओ ज़रा, मेरा जनाज़ा गुज़रने दो,
शायद उसे मेरी एक आख़िरी झलक मिल जाए।

शायरी 9

आज भी लोग मेरे जनाज़े से पूछ रहे थे,
क्या हुआ, क्यों छोड़ गया तू ये जहां?

शायरी 10

कितना सुकून है इस मौत की नींद में,
मेरा जनाज़ा चला तो भीड़ भी साथ चली।

शायरी 11

मुझे दफ़नाने के बाद वो लौटा, तन्हाई के आलम में,
पीछे से आवाज़ आई, ये कैसा जनाज़ा था।

शायरी 12

अब तो खुश हो जाओ, मैं चला गया हूं,
मेरा जनाज़ा देख कर तो मुस्करा दो।

शायरी 13

वो मेरे जनाज़े पर आए, पर जुबां खामोश थी,
आँखों से सब कह गए, जिसकी उम्मीद नहीं थी।

शायरी 14

आज शहर में चर्चा थी मेरे जनाज़े की,
जो कभी मेरे जीने की वजह नहीं बनी।

शायरी 15

इश्क़ की राह में मौत भी मंज़ूर थी हमें,
कम से कम जनाज़ा तो निकला सरे-बाजार।

शायरी 16

मेरे जनाज़े में वो शख्स भी आया था,
जिसने मेरी मौत की दुआएं मांगी थी।

शायरी 17

कैसा अजीब इंसाफ है इस दुनिया का,
ज़िंदा रहते कोई पूछता नहीं, और जनाज़े पर भीड़।

शायरी 18

जिसके लिए पलकें बिछाईं थीं हमने कभी,
आज वही कंधे पर मेरा जनाज़ा लिए खड़ा है।

शायरी 19

क़ब्र में लेटने से पहले ये सोचता रहा,
क्या मेरा जनाज़ा भी उसे महसूस हुआ होगा?

शायरी 20

एक अजीब सुकून मिला आज मुझे,
जब मेरा जनाज़ा मेरे घर से निकला।

शायरी 21

काश वो एक बार ही सही, मेरे जनाज़े पर आती,
तो मेरी रूह को सुकून मिल जाता।

शायरी 22

कौन कहता है मौत बुरी होती है,
आज तो मेरा जनाज़ा लेकर पूरा शहर निकला।

शायरी 23

ये दुनिया भी कितनी अजीब है यारों,
ज़िंदा रहते थे तब तन्हा थे, आज जनाज़े पर भीड़।

शायरी 24

आज मेरे जनाज़े पर आकर वो मुस्कुराई,
जैसे मेरी मौत से उसे राहत मिल गई हो।

Popular posts from this blog

सूखे पत्ते सी जिंदगी

सूखे पत्ते