Kafan (कफ़न)
कफ़न (Kafan): शायरी का संग्रह
शायरी 1
ज़िंदगी भर साथ देने का वादा किया था तुमने हमसे,
और जाते-जाते हमें एक कफ़न भी न दिया।
शायरी 2
मेरी कब्र पर आकर क्यों रोते हो यारों,
जब ज़िंदा था तब तो एक कफ़न भी न दिया।
शायरी 3
मौत की नींद सो रहा हूँ सुकून से अब,
बेशक मेरे बदन पर अब कफ़न है।
शायरी 4
तेरी याद में हम आज भी जीते हैं,
बस फर्क इतना है कि अब तन पर कफ़न है।
शायरी 5
इश्क़ में दिल तोड़ने वालों को क्या पता,
एक दिन उन्हें भी कफ़न में लिपटाया जाएगा।
शायरी 6
गरीब की मोहब्बत का मज़ाक मत उड़ाओ,
उसके पास देने को बस एक कफ़न ही होता है।
शायरी 7
जिस दिन मेरा जनाज़ा उठेगा, तुम्हें खबर मिलेगी,
उस दिन देख लेना, मेरे तन पर कफ़न होगा।
शायरी 8
बड़ी अजीब है ज़िंदगी की कहानी,
शुरुआत कपड़े से और अंत कफ़न से।
शायरी 9
तेरी बेवफाई ने ऐसा असर किया है मुझ पर,
जीते जी मर गया हूँ, बस कफ़न का इंतज़ार है।
शायरी 10
मोहब्बत तो कर ली, अब अंजाम से क्या डरना,
मिलना ही था एक दिन कफ़न को, तो क्या घबराना।
शायरी 11
खुदा करे तुझे भी मेरी तरह दर्द हो,
जब तेरी आँखों के सामने मेरा कफ़न हो।
शायरी 12
मेरे जनाज़े को कंधा देने वाले सुन ले,
मेरा कफ़न तेरी मोहब्बत का कर्जदार है।
शायरी 13
उसने कहा था लौट कर आऊंगा,
अब तो मेरे बदन पर कफ़न है।
शायरी 14
जब तक साँस थी तब तक तरसाया तुमने,
अब आ गए हो, मेरे जिस्म पर कफ़न देखकर।
शायरी 15
आज भी इंतज़ार है तेरा मेरी कब्र को,
शायद तुम आओगे मेरे कफ़न को देखने।
शायरी 16
वो क्या जानें दर्द-ए-दिल हमारा,
जो सिर्फ कफ़न से वाकिफ हुए।
शायरी 17
आखरी ख्वाहिश थी कि तुम आओ मेरी मैयत पर,
पर तुम आए तो सिर्फ मेरे कफ़न को हटाने।
शायरी 18
मेरा कफ़न ही मेरी आख़िरी उम्मीद है,
कि शायद अब चैन की नींद आए।
शायरी 19
क्या खूब कहा है किसी ने,
इंसान को एक दिन कफ़न पहनना ही है।