Jigar (जिगर)

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जिगर (Jigar): हिम्मत और हौसले पर शायरी

शायरी 1

तेरी बेवफाई का ज़हर पीकर भी,
मैंने अपने जिगर (जिगर) को मजबूत रखा।

शायरी 2

हर मुश्किल से लड़ जाने का हौसला,
मेरे जिगर (जिगर) में ही तो है बसा।

शायरी 3

दुनिया के रिवाजों से परे,
इश्क़ करने का जिगर (जिगर) हर किसी में नहीं।

शायरी 4

मोहब्बत की राह में काँटे हज़ार,
चलने को चाहिए फौलादी जिगर (जिगर) यार।

शायरी 5

तूफ़ानों से टकरा कर भी जो डरा नहीं,
समझ लो उसका जिगर (जिगर) कभी मरा नहीं।

शायरी 6

दर्द को हँसकर सह जाए जो,
वही सच्चे जिगर (जिगर) वाला कहलाए जो।

शायरी 7

रिश्तों को निभाने में बड़ी मेहनत लगी,
पर मेरे जिगर (जिगर) ने कभी हार नहीं मानी।

शायरी 8

ख्वाबों को हकीकत में बदलने के लिए,
जिगर (जिगर) चाहिए, सिर्फ बातें नहीं।

शायरी 9

ज़िंदगी की हर बाज़ी जीतने का दम,
मेरे जिगर (जिगर) में है, ये कोई नहीं कम।

शायरी 10

जब बात इज्ज़त की आई,
मेरा जिगर (जिगर) चट्टान बन खड़ा रहा।

शायरी 11

ज़माने की परवाह न की कभी,
अपने जिगर (जिगर) पे ही रहा हमेशा यकीं।

शायरी 12

दुश्मन के सामने भी सर न झुकाया,
ये मेरे जिगर (जिगर) की ही तो अदा है।

शायरी 13

हर चोट को सहने की आदत थी,
मेरे जिगर (जिगर) की यही फितरत थी।

शायरी 14

टूटे हुए दिल को फिर से जोड़ना,
सीखा है मैंने अपने जिगर (जिगर) से।

शायरी 15

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