Soz (सोज़)
सोज़-ए-दिल की गहराइयाँ: शायरी संग्रह
शायरी 1:
ज़िंदगी भर की तन्हाई का हासिल क्या है,
सिवाए इस सोज़-ए-निहाँ के, और हासिल क्या है।
शायरी 2:
दिल में इक उम्र से जो दर्द का आलम है,
ये सोज़-ए-इश्क़ है या कोई गहरा ग़म है।
शायरी 3:
तेरी यादों का हर लम्हा, मेरी जानिब आया,
साथ ले आया मेरे दिल का यह सोज़-ए-जुदाई।
शायरी 4:
हर एक आँसू में छिपी है, दास्तान-ए-ग़म,
कौन समझे इस दिल का, ये गहरा सोज़-ए-पस-ए-पर्दा।
शायरी 5:
महफ़िलें तो सजीं, पर दिल मेरा तन्हा रहा,
इस सोज़-ए-दरूँ को कोई समझ न सका।
शायरी 6:
इश्क़ ने क्या-क्या न दिए, ये दाग़-ए-दिल,
रह गया बस सीने में, यह सोज़-ए-मुसलसल।
शायरी 7:
शब-ए-फ़िराक़ में, नींद कहाँ आती है,
जागती आँखों में बस, सोज़-ए-ग़म छाती है।
शायरी 8:
हर साँस में बसा है, तेरा नाम ऐ सनम,
और हर नाम के साथ, ये सोज़-ए-दिल का मरहम।
शायरी 9:
खुशियों का दौर आया, पर मुझे रास न आया,
अज़ीब है ये सोज़, जो हर ख़ुशी में समाया।
शायरी 10:
अश्कों में बह गई, सारी रात की दास्तान,
छोड़ गया दिल में, ये सोज़-ए-अधूरी पहचान।
शायरी 11:
ज़ख्म-ए-दिल के, हर एक कतरे में है आग,
यही है वो सोज़-ए-पिन्हाँ, जिसकी न कोई दवा।
शायरी 12:
जब से तुमसे बिछड़े हैं, दिल बेकरार है,
हर धड़कन में महसूस होता, सोज़-ए-इंतज़ार है।
शायरी 13:
तेरी बेरुख़ी ने, हमें क्या से क्या कर दिया,
जीते जी, दिल में, सोज़-ए-हसरत भर दिया।
शायरी 14:
लफ़्ज़ों में बयाँ हो न सका, ये जो दर्द है,
खामोशी में छुपा है, ये सोज़-ए-गहरा।
शायरी 15:
अजब है ये दास्तान, दिल की वीरानियों की,
जहाँ बसा है सिर्फ़, सोज़-ए-रुसवाइयों की।
शायरी 16:
जला कर राख कर दिया, हर एक अरमान को,
बाकी है बस अब, ये सोज़-ए-बेपनाह को।
शायरी 17:
रोते हैं तारे भी, मेरी क़िस्मत पर रात भर,
क्या बताऊँ उन्हें, इस सोज़-ए-हाल-ए-सफ़र।
शायरी 18:
मुस्कुराहट के पीछे, छुपा रखा है एक जहाँ,
कोई क्या जाने इस दिल का, ये सोज़-ए-ग़म कहाँ।
शायरी 19:
अंधेरों में ही रहती है, अब मेरी पहचान,
क्यूँ कि रोशनी में भी है, ये सोज़-ए-गहराई की जान।
शायरी 20:
वफ़ा की राह में, सिर्फ़ ज़ख्म ही मिले,
फिर भी बाकी है, ये सोज़-ए-दिल के सिलसिले।
शायरी 21:
तेरी यादों से है, रोशन मेरी हर शाम,
मगर दिल में है, सोज़-ए-गम का ही नाम।
शायरी 22:
कोई पूछे तो क्या बताऊँ, इस दिल का हाल,
हर कोने में छुपा है, सोज़-ए-माज़ी का जमाल।
शायरी 23:
दर्द का लिबास ओढ़े, जी रहे हैं हम,
इस सोज़-ए-रूहानी से, क्या कम है कोई ग़म।
शायरी 24:
जब भी तन्हा होते हैं, याद आती है तेरी,
और इस याद से बढ़ती है, दिल की ये सोज़-ए-गहरी।
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