Fughan (फ़ुग़ाँ)
फ़ुग़ाँ: दर्द-ए-दिल की आवाज़
शायरी 1
दिल में दबा है दर्द, लबों पर है खामोशी,
कौन समझे इस दिल की फ़ुग़ाँ, ये तन्हाई।
शायरी 2
महफ़िल में भी तन्हा है मेरा दिल, ये क्या है?
हर सांस में उठती है एक दर्द भरी फ़ुग़ाँ।
शायरी 3
शाम ढले, जब याद तुम्हारी आती है,
लबों से निकलती है एक बेबस सी फ़ुग़ाँ।
शायरी 4
हर आह में छिपी है, एक कहानी अधूरी,
किसको सुनाएँ हम अपनी ये फ़ुग़ाँ, ये दूरी।
शायरी 5
चुपचाप सहते रहे ज़माने के सितम,
पर दिल से कभी कम न हुई फ़ुग़ाँ।
शायरी 6
तूफ़ान मेरे दिल में, आँखों में नमी है,
ज़ुबाँ पर ना आ सकी, वो मेरी फ़ुग़ाँ है।
शायरी 7
तन्हाई की रातें, अब और भी लंबी हैं,
तेरी याद में उठती हैं, ये दिल की फ़ुग़ाँ हैं।
शायरी 8
कहने को बहुत कुछ है, पर कह नहीं पाते,
बस आँखों से बहती है, ये खामोश फ़ुग़ाँ।
शायरी 9
जला दिया है इस दिल ने खुद को धीरे-धीरे,
अब राख में भी गूँजती है उसकी फ़ुग़ाँ।
शायरी 10
फ़लक तक जा पहुँची है, मेरी बेताब आहट,
क्या सुन रहा है कोई, इस दिल की फ़ुग़ाँ?
शायरी 11
हर रात तारों से करता हूँ बातें,
क्या वो भी सुनते हैं मेरी ये फ़ुग़ाँ?
शायरी 12
अश्कों में बह गई, सारी दास्तान-ए-ग़म,
बस रह गई है बाकी, एक दर्द भरी फ़ुग़ाँ।
शायरी 13
नज़रें ढूँढती हैं तुमको हर पल, हर घड़ी,
तुम्हारे बगैर ये दिल की फ़ुग़ाँ नहीं रुकती।
शायरी 14
कोई दवा नहीं है इस दर्द-ए-इश्क़ की,
बस बढ़ती ही जाती है ये दिल की फ़ुग़ाँ।
शायरी 15
वीरानियों में भी शोर है मेरे दिल का,
हर कोने से उठती है एक नई फ़ुग़ाँ।
शायरी 16
खुशियों की तलाश में उम्र गुज़र गई,
साथ बस रह गई है, ये मेरी फ़ुग़ाँ।
शायरी 17
जब से बिछड़े हो, चैन कहीं नहीं आता,
हर लम्हा बन गई है मेरी ये फ़ुग़ाँ।
शायरी 18
जुदाई का ज़हर, नस-नस में उतर गया,
अब तो रूह भी पुकारती है, "ऐ फ़ुग़ाँ"।
शायरी 19
गहरे हैं ज़ख्म इतने, कि भरते नहीं हैं,
हर सांस के साथ उठती है, ये फ़ुग़ाँ।
शायरी 20
किससे कहें दिल की बात, किसे सुनाएँ हम,
हमारी हर ख़ामोशी में है, एक फ़ुग़ाँ।
शायरी 21
जब रात की चादर तले, दुनिया सो जाती है,
तब मेरी तन्हाई, चीख उठती है फ़ुग़ाँ।
शायरी 22
बंजर हो गए हैं, अब ख्वाबों के खेत,
बस उम्मीद की जगह, है दर्द की फ़ुग़ाँ।
शायरी 23
अधूरा रहा हर अफ़साना, हर कहानी,
मेरी जिंदगी में बस रह गई है फ़ुग़ाँ।
शायरी 24
दुनिया की भीड़ में भी खुद को अकेला पाया,
क्या कोई सुन पाएगा मेरी ये फ़ुग़ाँ?
शायरी 25
जब यादों के आँचल से हवा गुज़रती है,
तब ज़ख्म फिर से उभरते हैं और उठती है फ़ुग़ाँ।