Aah (आह)

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दिल से निकली आह: दर्द-ए-इश्क की दास्तान

तेरी याद में हर पल दिल से निकलती है,
यह मेरी खामोश आह, जो तुझे पुकारती है।

हर रात आँखों से बहते हैं अश्क बनकर,
और सुबह होते ही दिल से निकलती है एक आह

जख्मों को छिपाकर मुस्कुराना सीखा है हमने,
पर अंदर ही अंदर एक दर्द भरी आह है।

क्या खबर थी मोहब्बत इतनी रुलाएगी,
हर साँस के साथ एक लंबी आह आएगी।

वो जो कहते थे कभी बिछड़ेंगे नहीं,
आज उनकी याद में बस एक आह भरते हैं।

दर्द की कहानी लबों पर आ न सकी,
आँखों से बही और दिल से निकली आह

सूखी पलकों से कब तक छिपेंगे आँसू,
आखिर एक दिन तो निकलेगी बेबस आह

इंतज़ार की घड़ियाँ लंबी हुई इतनी,
कि अब हर पल सिर्फ एक गहरी आह है।

शाम-ए-गम में जब चांद भी छिप जाता है,
तन्हाई में मेरी दिल से निकलती है आह

उनकी बेरुख़ी ने दिल को इतना तोड़ा,
कि अब लबों पर हंसी नहीं, बस है आह

मोहब्बत के बाजार में हमने क्या पाया,
सिवाए दर्द के और लंबी आह के।

खुदा से अब क्या शिकवा करें हम,
जब अपनी किस्मत में लिखी है यह आह

बहारों का मौसम भी अब रास न आए,
जब दिल से निकलती हो हर पल एक आह

किसको सुनाएं हम अपने दिल का हाल,
जब हर बात पर निकल जाती है आह

ग़म का साया ऐसे घेरा है मुझको,
कि अब खुशी में भी निकल जाती है आह

जब भी तेरा नाम आता है लबों पर,
न जाने क्यों दिल से निकलती है एक आह

ये तन्हा रातें, ये बेबस चाँदनी,
हर चीज़ से उठती है एक दर्द भरी आह

ज़िन्दगी ने दिए हैं इतने गहरे ज़ख्म,
कि अब लबों पर सिर्फ़ रह गई है आह

उनकी यादें अब भी दिल में बसी हैं,
और इन यादों के साथ आती है आह

कैसे कहें कि हम कितने बेकरार हैं,
हर बात में अब निकलती है आह

शिकायतें बहुत हैं मगर किससे कहें,
जब सुनने वाला ही बन गया आह

टूटे हुए ख्वाबों का बोझ इतना है,
कि अब हर पल बस निकलती है आह

जिन्हें हम अपना कहते थे कभी,
उनकी जुदाई ने दी है ये गहरी आह

लबों पर खामोशी, दिल में है शोर,
यही तो है मेरी हर लम्बी आह का जोर।

प्यार की राहों में मिलते हैं कांटे बहुत,
हर चोट पर दिल से निकलती है एक आह

रूठी हुई तकदीर से अब क्या उम्मीद,
जब हर खुशी के बाद आती है आह

उनकी यादों से भरी है मेरी महफ़िल,
हर याद के साथ गूंजती है दिल की आह

ये रातें भी अब सोने नहीं देती,
हर पल जगाकर पूछती हैं, क्यों निकलती है आह?

गम का सागर गहरा होता जा रहा है,
और मेरी हर सांस से निकलती है एक आह

मुश्किलें इतनी हैं कि अब सहते-सहते,
हर ज़ुबां पर बस रह गई है आह

कभी सोचा न था कि ऐसा भी होगा,
कि खुशियों की जगह बस निकलेगी आह

उनकी महफ़िल में हम गैर बन गए,
लौटते हुए दिल से निकली एक आह

दिल का हर कोना दर्द से भरा है,
हर धड़कन के साथ एक खामोश आह

जब से तुम गए हो ज़िन्दगी से मेरी,
हर सुबह एक नई आह के साथ होती है।

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