शुक्र (Shukr) की सौगात: दिल से निकली हर आवाज़
शायरी 1
रब का है ये करम, जो ये साँसें मिली हैं,
हर पल करते हैं शुक्र, कि ज़िन्दगी हसीन मिली है।
शायरी 2
तेरी हर अता पर, मेरी ज़ुबां से निकला,
ऐ खुदा, तेरा लाख-लाख शुक्र, जो तूने इतना नवाज़ा।
शायरी 3
छोटे-छोटे लम्हों में, खुशियों का डेरा है,
हर एक पल का करते हैं शुक्र, जब तू साथ मेरा है।
शायरी 4
अंधेरों में भी जो रौशनी मिली है,
उस उजाले का करते हैं शुक्र, जो तेरी मेहरबानी है।
शायरी 5
गिरने पर संभाला है, उठने पर हौसला दिया,
कैसे ना कहें तेरा शुक्र, तूने हर मोड़ पर सहारा दिया।
शायरी 6
फूलों की खुशबू, भोर का ये नज़ारा,
हर कुदरत की नेमत का है शुक्र हमारा।
शायरी 7
जो मिला, वो भी अच्छा, जो ना मिला, वो भी बेहतर,
तेरी हर मर्ज़ी पर करते हैं शुक्र, ऐ मेरे दाता।
शायरी 8
दुआओं में रहती है, तेरी याद सदा,
तेरी इनायत पर करते हैं शुक्र, ऐ खुदा।
शायरी 9
गमों को भी सहा, खुशियों को भी जिया,
इस रंगीन दुनिया में हर एहसास का है शुक्र किया।
शायरी 10
मुस्कुराहटें जो चेहरे पर सजी हैं,
तेरी रहमत का है शुक्र, जो ये हमें मिली हैं।