ज़मीर (Zameer) पर दिल को छू लेने वाली शायरियां
जब तक है जान, आवाज दो अपने आपको,
सोया हुआ ज़मीर (ज़मीर) अक्सर मर चुका होता है।
कितने ही पर्दों में छुपाया है खुद को मैंने,
मगर आइना दिखा देता है मेरा ज़मीर (ज़मीर)।
खामोश हो गया है क्यों तेरा दिल आजकल,
क्या कहीं सो गया है तेरा ज़मीर (ज़मीर)।
दुनिया की दौलत से खरीदा नहीं जाता,
कीमती बहुत होता है, एक जिंदा ज़मीर (ज़मीर)।
सौदा किया ना कभी ईमान का मैंने,
इसलिए हमेशा पाक रहा मेरा ज़मीर (ज़मीर)।
कुछ फैसले जो मैंने खुद से किए हैं,
गवाह है उनका मेरा सोया हुआ ज़मीर (ज़मीर)।
आज फिर उसकी आवाज़ ने मुझे जगाया,
शायद मेरा ज़मीर (ज़मीर) मुझसे कुछ कहना चाहता है।
दौलत के पीछे भागते रहे उम्र भर,
कब हमने अपने ज़मीर (ज़मीर) की सुनी।
झूठ की बुनियाद पर रिश्ते टिके नहीं,
सच तो हमेशा बोलता है मेरा ज़मीर (ज़मीर)।
माना कि राहें कठिन थीं, अंधेरे भी थे,
पर रोशनी बन कर आया मेरा ज़मीर (ज़मीर)।
लोग कुछ भी कहें, परवाह नहीं मुझे,
जब मेरा ज़मीर (ज़मीर) मुझ पर इल्जाम न लगाए।
गिरने न देना कभी अपने मूल्यों को,
वरना चीख उठेगा तेरा ज़मीर (ज़मीर)।
गुनाहों के बाजार में भटक गए थे हम,
आवाज़ दी फिर से, मेरे ज़मीर (ज़मीर) ने।
सोचा था, दुनिया में सब कुछ मिल जाएगा,
पर सुकून तो सिर्फ सच्चे ज़मीर (ज़मीर) में है।
आत्मा की आवाज़ सुन लो कभी,
यही तो है तेरा सच्चा ज़मीर (ज़मीर)।
बिकाऊ नहीं होता इंसानियत का मोल,
अगर जिंदा हो उसका ज़मीर (ज़मीर)।
दोष दूसरों को देना छोड़ दे ऐ इंसान,
पहले अपने ज़मीर (ज़मीर) में झांक के देख।
क्या फायदा उस शोहरत का ऐ दोस्त,
जो ज़मीर (ज़मीर) को बेचकर हासिल हुई हो।
कभी-कभी रात की खामोशी में,
मेरा ज़मीर (ज़मीर) मुझसे सवाल करता है।
बुराई पर जीत हासिल करनी हो तो,
अपने ज़मीर (ज़मीर) को जगाना सीख।
वो इंसान कभी खुश नहीं रह सकता,
जिसने मार दिया हो अपना ज़मीर (ज़मीर)।
गलत राह पर चलते-चलते थक गया था,
फिर से सही राह पर ले आया मेरा ज़मीर (ज़मीर)।
इज्जत की बात थी या थी कोई मजबूरी,
किस मोड़ पर खो गया तेरा ज़मीर (ज़मीर)।
भले ही अंधेरों में जी ले तू अपनी जिंदगी,
पर अपने ज़मीर (ज़मीर) को रोशनी देना मत भूल।
दुनिया की हर बात मान ली हमने,
एक अपने ज़मीर (ज़मीर) को ही न सुन पाए।
ईमानदारी की राह पर चलना मुश्किल है,
पर ज़मीर (ज़मीर) हमेशा साथ देता है।
दर्द की गहराई में डूब रहा था दिल,
तभी मेरा ज़मीर (ज़मीर) मुझे उभारने आया।
सच्चाई की राह में अकेले ही सही,
जब तक ज़मीर (ज़मीर) साथ है, कोई डर नहीं।
दिल की गहराइयों में छुपा है ये,
जिसे कहते हैं इंसान का ज़मीर (ज़मीर)।
दुनिया की हर चमक फीकी पड़ जाती है,
जब चमकता है इंसान का ज़मीर (ज़मीर)।
हार मान ली थी जब मैंने हर जंग से,
तब आवाज़ देकर जगाया मेरे ज़मीर (ज़मीर) ने।
✨ दिल की गहराई से निकले बोल, जो जगा दें आपके ज़मीर (ज़मीर) को। ✨
ऐसी और अनमोल शायरियों के लिए हमारे ब्लॉग पर पधारें।
Reviewed by Editor
on
अक्टूबर 11, 2026
Rating:
कोई टिप्पणी नहीं: