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Be-asra (बे-आसरा)

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बे-आसरा (Be-asra) शायरी संग्रह

शायरी 1

दुनिया की भीड़ में खोया, कोई साथी नहीं मिलता,
आज इस दिल का मुसाफ़िर, बड़ा बे-आसरा फिरता।

शायरी 2

जब टूट जाएं सब रिश्ते, उम्मीदों का दामन छूटे,
उस टूटे हुए दिल से, आवाज़ उठे बे-आसरा की।

शायरी 3

राहों में कांटे बिखरे हैं, मंज़िल का पता नहीं,
हर कदम पे ठोकर खाए, मेरा दिल बे-आसरा कहीं।

शायरी 4

आसमान के नीचे मैं हूँ, ज़मीन पे मेरा साया भी नहीं,
ऐ खुदा! ये कैसा हाल है, मैं कितना बे-आसरा हूँ।

शायरी 5

सूखे पत्तों सी ज़िंदगी, हवाओं में उड़ रही है,
कोई ठिकाना नहीं, रूह मेरी बे-आसरा फिर रही है।

शायरी 6

जब से छूटा तेरा दामन, दिल मेरा उदास रहता है,
हर पल हर घड़ी जानेमन, मैं खुद को बे-आसरा कहता हूँ।

शायरी 7

रात की तन्हाई में अक्सर, तेरी यादें सताती हैं,
सुबह होने तक ये आँखें, खुद को बे-आसरा पाती हैं।

शayari 8

टूट गए सब तारे, अब चांदनी भी रूठी है,
ज़िंदगी की हर खुशी मुझसे, आज बे-आसरा छूटी है।

शायरी 9

कोई सहारा नहीं, कोई ठिकाना नहीं मिलता,
इस रेगिस्तान में दिल, बे-आसरा सा जलता है।

शायरी 10

दर्द की हर एक लहर में, डूबने का डर है,
कश्ती भी मेरी टूटी, मैं कितना बे-आसरा हूँ।

शायरी 11

फूलों का क्या कसूर, जब माली ही रूठ जाए,
हर कली बे-आसरा होकर, पत्तों से भी छूट जाए।

शायरी 12

छोड़ दिया है सबने, अब किसकी पनाह में जाऊँ,
हर तरफ अँधेरा है, मैं बे-आसरा कहाँ जाऊँ।

शायरी 13

कोई मंज़िल नहीं मिलती, कोई राह नज़र नहीं आती,
ज़िंदगी यूँ ही कट रही है, मैं बे-आसरा रह जाता हूँ।

शायरी 14

दिल में हज़ार दर्द हैं, लबों पे खामोशी है,
इस ज़ालिम दुनिया में, मैं कितना बे-आसरा हूँ।

शायरी 15

जब से रूठा मेरा यार, नींदें भी उड़ गईं हैं,
हर ख्वाब मेरा टूटा, मैं बे-आसरा रह गया हूँ।

शायरी 16

वक्त की लहरों पे, बहता हुआ तिनका हूँ मैं,
कोई किनारा नहीं, कितना बे-आसरा हूँ मैं।

शायरी 17

मेरी दुनिया वीरान है, हर तरफ सन्नाटा है,
ऐ खुदा! मुझ बे-आसरा का, बस तू ही सहारा है।

शायरी 18

ख़ाक हो गए सारे सपने, अब क्या बचा है मेरे पास,
हर उम्मीद टूट गई, मैं बे-आसरा हूँ आज।

शायरी 19

चाहत की दुनिया में, हम कुछ ऐसे बिखर गए,
हर खुशी से दूर होकर, बे-आसरा रह गए।

शायरी 20

गमों की धूप में जला, मेरा हर एक अरमान,
कोई साया नहीं मिला, मैं कितना बे-आसरा हूँ।

शायरी 21

बेशक कदम डगमगाए, पर दिल ने हार ना मानी,
मगर इस दुनिया में, मैं कितना बे-आसरा हूँ।

शायरी 22

रोशनी की तलाश में, भटक रहा है दिल मेरा,
हर तरफ अँधेरा है, मैं बे-आसरा हूँ क्या करूँ।

शायरी 23

सपनों की दुनिया में, अक्सर खो जाता हूँ,
जागता हूँ तो खुद को, बे-आसरा पाता हूँ।

शायरी 24

कोई पूछता नहीं हाल मेरा, कोई करीब नहीं आता,
इस तन्हा सफर में, दिल मेरा बे-आसरा रह जाता है।

शायरी 25

मुश्किलों के इस दौर में, सहारा कोई ना मिला,
हर घड़ी इस दिल को, खुद से बे-आसरा पाया।

शायरी 26

जिंदगी की किताब में, कितने ही पन्ने खाली हैं,
हर कहानी मेरी, बे-आसरा सी लिखी है।

शायरी 27

वो गए तो क्या हुआ, दिल में दर्द छोड़ गए,
हम तो पहले ही थे बे-आसरा, अब और तोड़ गए।

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