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Sog (सोग)

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सोग (Sog) पर दिल छू लेने वाली शायरी

शायरी 1

ज़िंदगी में जब कोई अपना बिछड़ जाए,
तो दिल में बस सोग ही रह जाए।

शायरी 2

हर खुशी आज बेमानी सी लगती है,
जब से दिल में सोग की कहानी सी लगती है।

शायरी 3

आँखों से बहते आँसुओं की धार में,
डूबा है दिल आज भी सोग के बाज़ार में।

शायरी 4

रात की तन्हाई में अक्सर जागा करते हैं,
हम अपने सोग से कुछ यूँ भागा करते हैं।

शायरी 5

वो खुशियाँ अब कहाँ जो कभी मिलती थीं,
अब तो बस सोग की लहरें ही दिखती थीं।

शायरी 6

दिल के हर कोने में एक दर्द छुपा है,
यह सोग ही तो है जिसने हमें रूलाया है।

शायरी 7

तन्हाई में जब यादें सताती हैं,
तब आँखों में सोग की घटा छाती है।

शायरी 8

जाने कितने ज़ख्म हैं इस दिल में,
हर ज़ख्म पर है सोग का मरहम।

शायरी 9

ख़ामोशी भी अब तो शोर करती है,
जब दिल में सोग की बात उभरती है।

शायरी 10

खुशियों का दौर अब खत्म हुआ,
जिंदगी में अब बस सोग ही जमा हुआ।

शायरी 11

यह कैसा इम्तेहान है, या रब,
हर तरफ बस सोग और गम ही गम।

शायरी 12

रो-रोकर थक गईं आँखें मेरी,
ना खत्म हुआ सोग, ना कम हुई पीर मेरी।

शायरी 13

किससे कहें दिल की दास्तान-ए-सोग,
यहाँ हर कोई अपने ही दर्द में है महफूज़।

शायरी 14

तारे भी आज गुमसुम से लगते हैं,
शायद वो भी हमारे सोग को समझते हैं।

शायरी 15

रौनकें दुनिया की अब भाती नहीं,
दिल को अपने सोग से फुर्सत आती नहीं।

शायरी 16

हर लम्हा अब एक सदी सा लगता है,
जब से दिल सोग में डूबा हुआ रहता है।

शायरी 17

कौन जाने कब ये रात कटेगी,
कब मेरे सोग की घटा छंटेगी।

शायरी 18

हर खुशी ने हमसे मुँह मोड़ा है,
सोग ने ही तो दामन हमारा पकड़ा है।

शायरी 19

अंधेरों में ही अब जी रहे हैं,
हम अपने सोग के आँसू पी रहे हैं।

शायरी 20

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