शिकस्त (हार) पर दिल को छू लेने वाली शायरियाँ
शायरी 1
इश्क़ में मिली ऐसी शिकस्त है हमको,
कि अब हर मंज़िल लगती है बेबस हमको।
शायरी 2
ज़िंदगी की जंग में कई बार खाई शिकस्त,
पर हौसला न टूटा, रहा दिल हमेशा दुरुस्त।
शायरी 3
हर मोड़ पर मिली है जब से ये शिकस्त,
ख़ामोश हो गए हैं अब सारे अहल-ए-मस्त।
शायरी 4
दिल ने माना नहीं कभी हार, खाई शिकस्त हज़ार,
उम्मीद का दामन थामे, चलता रहा बेक़रार।
शायरी 5
जब देखा आईने में अपनी हारी हुई सूरत,
हर तरफ़ से महसूस हुई एक गहरी शिकस्त।
शायरी 6
लड़ाई तकदीर से थी, किस्मत ने दी शिकस्त,
रूह थक गई पर लबों पर रही एक मुस्कुराहट शिस्त।
शायरी 7
मोहब्बत की दुनिया में ये कैसा दस्तूर है,
जो हार गया, उसे मिलती है बस शिकस्त का फितूर है।
शायरी 8
हमने चाहा था जीतना, पर मुक़द्दर की थी शिकस्त,
अब यादों के खंडहरों में भटकती है आत्मा पस्त।
शायरी 9
ख्वाबों के महल गिर गए, जब मिली ये शिकस्त,
फिर भी दिल में उम्मीद की लौ है कुछ अकलमस्त।
शायरी 10
तूफां से लड़कर भी आखिर हो गई शिकस्त,
कश्ती डूब गई, साहिल भी रहा अब अदम मस्त।
शायरी 11
हर कोशिश के बाद भी मिली हमें शिकस्त,
समझ नहीं आता, किस बात की ये है सख़्त परखस्त।
शायरी 12
अपनी अना पर जब आया था गुरूर,
एक पल में मिल गई हमको ऐसी शिकस्त ज़रूर।
शायरी 13
दुनिया की रस्मों ने हमको दी शिकस्त,
प्यार का रिश्ता तोड़कर कर दिया पस्त।
शायरी 14
जब यार ने छोड़ा साथ, तो हुई रूह को शिकस्त,
अब हर ख़ुशी लगती है जैसे बस बेवक़्त।
शायरी 15
उम्मीदों का सूरज डूबा, जब आई ये शिकस्त,
हर तरफ़ छा गया अंधेरा, दिल भी रहा है व्यस्त।
शायरी 16
गैरों से क्या शिकायत, जब अपनों ने दी शिकस्त,
टूट कर बिखर गए हैं ख्वाब सारे बे-तरतीब।
शायरी 17
कभी सोचा न था कि ये दिन भी आएगा,
जब अपनी ही ज़िंदगी से मिलती शिकस्त पाएगा।