मज़हब (Mazhab) पर शानदार शायरी
1. दिल का रिश्ता
इश्क़ का रास्ता सीधा है, कहाँ उलझता है,
ये दिल किसी एक मज़हब से कहाँ संभलता है।
2. इंसानियत का पैगाम
इंसानियत ही सबसे बड़ा मज़हब है दोस्त,
बाकी सब तो बस दुनियावी दीवारें हैं, तोड़ दे इन्हें मस्त।
3. दिलों को जोड़ो
क्या हिंदू, क्या मुस्लिम, क्या सिख, ईसाई,
सच्चा मज़हब तो दिलों को जोड़ना है, भाई।
4. रूह का सच
मंदिर-मस्जिद में बाँट दिया दुनिया को तुमने,
लेकिन रूह का कोई मज़हब नहीं होता, ये भूलो न तुम।
5. रूहानी रोशनी
दिल में मुहब्बत हो तो हर दरगाह अपनी है,
मज़हब की क्या सीमा, ये तो रूहानी रोशनी है।
6. प्रेम की गंगा
जहाँ प्रेम की गंगा बहती है, वहाँ मज़हब का क्या काम,
बस एक ही नाम जपो, मानवता का नाम।
7. अमर दुआएँ
काग़ज़ पर लिखे मज़हब बदलते रहते हैं,
दिल में बसी दुआएँ कभी नहीं मरते हैं।
8. ज़मीर की आवाज़
ज़मीर की आवाज़ सुन, वही तेरा मज़हब है,
वरना दीवारों में कैद होना ही सबका अजब है।
9. कुदरत का रंग
किसी एक रंग में रंग न जाना प्यारे,
कुदरत का हर रंग ही तो तेरा मज़हब है सारे।
10. नेकी का धर्म
फर्क़ क्या पड़ता है किस खुदा को पूजते हो,
अगर दिल में नेकी हो, तो वही तुम्हारा मज़हब है सो।
11. सेवा ही सबसे बड़ा
गर आँसुओं को पोंछ सको किसी मजबूर के,
तो समझो तुमने पा लिया सबसे ऊँचा मज़हब ज़माने भर के।
12. नफ़रत का ज़हर
मज़हब सिखाता नहीं आपस में बैर रखना,
हम ही हैं जो सीख जाते हैं, नफ़रत का ज़हर रखना।
13. एक है इंसान
क्यों लड़ते हो लकीरों पर, क्या मिलेगा तुम्हें,
ख़ुदा एक है, एक है इंसान, यही तो असली मज़हब है।
14. प्रेम का बोलबाला
कोई कहता है ये मज़हब अच्छा, कोई वो बताता है,
मैं तो कहता हूँ, जो प्रेम दे, वही सब पे छाता है।
15. गुलशन दुनिया
ये दुनिया एक बगीचा है, हर फूल का अपना रंग,
मज़हब के नाम पर क्यों करते हो इसे बेरंग?
16. खून का रंग
रंगों में बँटा है ज़माना, पर खून का एक ही रंग,
समझो इस बात को, मज़हब से ऊपर है संग।
17. खुदा की तलाश
ख़ुदा की तलाश में क्यों भटकता है इंसान,
तेरे अंदर ही तो है असली मज़हब का ज्ञान।
18. इबादत का जज़्बा
हर दिल में एक रौशनी है, एक इबादत का जज़्बा,
इसी को समझ ले, यही है तेरा सच्चा मज़हब।