Shikwa (शिकवा)
शिकवा (Shikwa) - दिल की आवाज़ और ख़ामोश गुज़ारिशें
मुझे तुमसे कोई शिकवा नहीं, बस इतना है,
तुमने क्यों बदल दी अपनी राहें यूँ ही तन्हा।
लबों पर शिकवा लिए फिरता हूँ मैं,
कि दिल को राहत क्यों नहीं मिलती तुझ बिन।
हर बात पर शिकवा करना क्या ठीक है,
कभी अपनी गलतियाँ भी तो देख, ऐ दोस्त!
उनकी बेरुखी से शिकवा क्या करें हम,
हम ही थे जो बेखबर उनकी अदाओं से।
रात भर जागकर चाँद से शिकवा किया,
क्यों मेरी तन्हाई का साथी तू भी नहीं रहा।
मेरे हर शिकवा का जवाब तुम हो,
पर तुमसे ही शिकवा कैसे करूँ मैं?
दिल में छुपा है एक गहरा शिकवा,
जो लबों तक आते-आते रुक जाता है।
तुमसे शिकवा करने की हिम्मत नहीं,
बस आँखों में नमी बन के रह जाता है।
उनकी खामोशी से क्या शिकवा करें,
जब हमारी बातों में ही दम न रहा।
जमाना करे लाख शिकवा मुझसे,
मुझे तो बस तुमसे ही गिला नहीं।
क्यों करते हो हर बात का शिकवा हमसे,
कभी खुद को भी तो परख के देखो।
ये कैसा शिकवा है ज़िंदगी से मेरा,
जो हासिल है, उसकी कदर नहीं करता।
तुम्हारी बेवफाई से कोई शिकवा नहीं,
बस दिल को थोड़ा सा मलाल है।
हर आह में छुपा है एक शिकवा गहरा,
कोई समझता नहीं इस दर्द का चेहरा।
गर तुम्हें हमसे शिकवा है तो कहो,
खामोशी से दिल को क्यों सताते हो।
अब तो खुद से ही शिकवा है मुझे,
क्यों तुम पर इतना ऐतबार किया था।
कोई शिकवा नहीं है अब तुमसे,
किस्मत ने हमें जुदा कर दिया।
यूँ तो हजार शिकवे हैं जमाने से,
पर तुमसे तो कोई गिला नहीं।
तुम्हारा हर शिकवा सिर आँखों पर,
बस मेरी मोहब्बत पर शक न करो।
शिकवा करूँ भी तो किससे करूँ,
जब सुनने वाला ही बेखबर हो।
मेरी आँखों में देखो, शिकवा नज़र आएगा,
तुम्हें भी अपनी गलती का एहसास हो जाएगा।
शिकवा नहीं कि तुमने प्यार नहीं किया,
शिकवा ये है कि झूठ क्यों बोला।
हर खुशी में एक शिकवा छुपा है,
शायद ये दिल ही कुछ नाराज़ है।
तुम लाख शिकवे करो, मैं सुन लूँगा,
बस मुझे छोड़कर जाने की बात न करना।
कभी-कभी बेमकसद शिकवा भी अच्छा लगता है,
कम से कम कोई तो पूछता है हाल।
मेरा शिकवा बस इतना है तुमसे,
तुमने दिल दुखाया, पर कभी बताया नहीं।
जो तुमसे शिकवा है वो दिल में ही रखूँगा,
तुम्हें अपनी खताओं का एहसास न कराऊँगा।
तेरी यादों से शिकवा करूँ भी तो क्या,
वो तो हर पल मेरे
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