गुमान (Gumaan): भावनाओं का आइना और रिश्तों की सच्चाई
शायरी 1
तेरे लहजे में आज भी वही गुमान (गुमान) है,
लगता है तुम्हें अभी भी अपनी जीत का इम्कान है।
शायरी 2
मत कर इतना अपने हुस्न पर गुमान (गुमान) ए दोस्त,
बर्बाद हुए कितने आशिक़, इस मिट्टी में तू भी होगी ध्वस्त।
शायरी 3
वक़्त की मार ने तोड़ दिया हर गुमान (गुमान),
वरना आसमान छूने का था मेरा भी अरमान।
शायरी 4
कभी मत करना अपनी दौलत पर गुमान (गुमान),
ये तो आती-जाती छाया है, कब बदल जाए तकदीर का मान।
शायरी 5
उसके दिल में शायद था कोई गुमान (गुमान),
वरना ऐसे रुठ कर जाने की कोई बात न थी जान।
शायरी 6
अपने हुनर पर करो यकीं, पर न करो गुमान (गुमान),
बड़ा बनने की होड़ में, खो न देना अपनी पहचान।
शायरी 7
जब तक साँस है, ये दिल में गुमान (गुमान) रहेगा,
तेरे प्यार की खातिर हर पल कुर्बान रहेगा।
शायरी 8
छोटे से कद पे बड़ा गुमान (गुमान) क्यों है,
अरे इंसानों की बस्ती में हर कोई यहाँ मेहमान क्यों है।
शायरी 9
झुकते नहीं वो लोग, जिनमें होता है गुमान (गुमान),
टूटे हुए शीशे से भी ज़्यादा होता है उनका नुकसान।
शायरी 10
अधूरा ज्ञान और झूठा गुमान (गुमान),
इंसान को ले डूबे, न बचे उसकी कोई शान।
शायरी 11
क्या हासिल होगा तुम्हें इस झूठे गुमान (गुमान) से,
जब सब कुछ छूट जाएगा तुम्हारे हाथ से।
शायरी 12
मेरी आँखों में प्यार था, पर तेरे दिल में गुमान (गुमान),
कैसे बनता हमारा रिश्ता, कैसे मिलती हमारी शान।
शायरी 13
टूटते सितारे सा तेरा गुमान (गुमान) है,
कुछ पल की चमक, फिर गुमनामी का निशान है।
शायरी 14
क्यों रखते हो अपनी बात का इतना गुमान (गुमान),
क्या पता कल ये जुबाँ ही न रहे, न रहे कोई निशान।
शायरी 15
इश्क़ की राह में कहाँ होता है कोई गुमान (गुमान),
यहाँ तो सिर झुकता है, मिट जाती है अपनी पहचान।