मुक़द्दर (Muqaddar) पर दिलकश शायरी
लिखा है जो मेरे मुक़द्दर में, वो होकर ही रहेगा,
कितना भी बदल लूँ राहें, ये रास्ता वहीं चलेगा।
इंसान की हिम्मत का इम्तिहान भी क्या खूब है,
वो लड़ता है सबसे, जब सामने उसका मुक़द्दर हो।
तेरी यादों का साया मेरे साथ चलता है,
क्या करूँ, मेरे मुक़द्दर में तू ही लिखा मिलता है।
हम तो चले थे मंज़िल की तलाश में कहीं और,
पर जाने कहाँ ले आया ये मुक़द्दर मोड़ पर।
जब आँखें खुलीं तो देखा, सब कुछ बदल चुका था,
ये मेरे मुक़द्दर का कैसा नया खेल शुरू हुआ था।
कुछ लोग आते हैं ज़िंदगी में, बस पल भर के लिए,
शायद ऐसा ही लिखा था उनके मुक़द्दर में मेरे लिए।
हर कोशिश अधूरी रही, हर ख्वाब टूट गया,
शायद मेरे मुक़द्दर में बस यही लिखा छूट गया।
हमने अपनी राह चुनी थी, अपने दम पर जीने की,
पर मुक़द्दर ने अपनी राह दिखाई, किसी और ठिकाने की।
अगर मुक़द्दर में हो मिलना, तो ज़रूर मिलेंगे हम,
चाहे राहें कितनी भी कठिन हों, चाहे बढ़ जाएं गम।
शिकायतें नहीं हैं ज़िंदगी से, बस थोड़ा अफसोस है,
क्यूँ मेरा मुक़द्दर मुझसे इतना बेअंदाज है।
क्या पता था कि ये दिन भी देखना पड़ेगा कभी,
कि मेरा मुक़द्दर मुझसे रूठ जाएगा अभी।
जो लिखा है वो तो मिलना ही है, कौन टाल सकता है,
बस मुक़द्दर से ये गुज़ारिश है, थोड़ा सब्र दे दे।
तेरे बिना जीना है अब, ये बात समझ आई है,
शायद मेरे मुक़द्दर में यही तन्हाई आई है।
सोचा था कुछ और, हुआ कुछ और ही,
मेरे मुक़द्दर की ये कैसी है खुदाई।
कितनी भी दुआएँ मांग लो, क्या फर्क पड़ता है,
जो तुम्हारे मुक़द्दर में नहीं, वो कहाँ मिलता है।
ये कैसा खेल है दुनिया का, ये कैसी रीत है,
हमारा मुक़द्दर भी अजीब सी एक जीत है।
कभी सोचा न था कि ऐसे दिन भी आएंगे,
जब अपने ही मुक़द्दर पर हम अफ़सोस जताएंगे।
हम तो बस अपनी राह पर चलते रहे बेखबर,
और मुक़द्दर ने हमें कर दिया दर-ब-दर।
हर शख्स की अपनी कहानी, अपना ही फ़साना है,
किसी का मुक़द्दर आबाद, किसी का वीराना है।
कोशिशें करते रहो, हार मत मानो ऐ दिल,
क्या पता कब बदल जाए तेरा मुक़द्दर और मंज़िल।
खुदा जाने कहाँ ले जाएगा ये मुक़द्दर हमें,
किस राह पे छोड़ जाएगा, ये नहीं मालूम हमें।
तेरी हँसी में छुपा मेरा भी एक जहां है,
काश मेरे मुक़द्दर में तेरा ही नाम लिखा हो वहाँ।
हमने तो बस प्यार मांगा था, दिल की गहराइयों से,
पर मुक़द्दर ने दिए दर्द, भरी तन्हाइयों से।
जो चाहा वो मिला नहीं, जो मिला वो भाया नहीं,
कैसा मुक़द्दर है मेरा, जो कभी साथ आया नहीं।
कभी-कभी लगता है, ये ज़िंदगी एक किताब है,
जिसके पन्ने लिखता है मेरा मुक़द्दर बेहिसाब है।
हर सुबह एक नई उम्मीद, हर शाम एक नया गम,
क्या यही है मेरा मुक़द्दर, जो लिख दिया है कम।
ये इश्क़ भी अजब बला है, हर इम्तिहान लेता है,
जिसके मुक़द्दर में हो, बस उसी को देता है।
तेरी चाहत में ऐसे गुम हुए कि होश ही न रहा,
शायद मेरे मुक़द्दर में यही एक रोग लिखा था।
चाहे कितना भी बदल लो अपने इरादे,
मुक़द्दर अपनी राह पर ही चलते वादे।
खुदा की मर्ज़ी है ये, या है कोई इम्तिहान,
कि मेरा मुक़द्दर ही मुझसे रहता है अंजान।
और भी खूबसूरत नज़्में...
"हर लफ्ज़ में एक कहानी, हर कहानी में एक एहसास।
ढूंढिए अपने दिल के करीब कुछ और खास!"
Reviewed by Editor
on
सितंबर 28, 2026
Rating:
कोई टिप्पणी नहीं: