Zaalim (ज़ालिम)
ज़ालिम की दुनिया: दर्द, मोहब्बत और इंतज़ार
ज़ालिम इश्क़ के अफ़साने
तेरी बेरुखी ने हमें इतना बेबस कर दिया,
कि हर सांस में तेरा ज़ालिम नाम लेते रहे।
कब तक सहें हम ये ज़ालिम दुनिया के सितम,
एक तेरी मोहब्बत ही थी, वो भी बेवफ़ा निकली।
उसकी आँखों में ज़ालिम सा नशा था ऐसा,
कि होश खो बैठे और खुद को लुटा बैठे।
मौसम बदल गए, पर तेरा लहजा वही रहा ज़ालिम,
हम आज भी तेरे इंतजार में बैठे हैं, वहीं के वहीं।
हर रात चाँद से कहते हैं हम अपनी दास्ताँ,
कैसे एक ज़ालिम ने हमारी दुनिया उजाड़ दी।
तेरे इश्क़ में हमने क्या-क्या न सहा ज़ालिम,
खुद को मिटा दिया तेरी हर खुशी के लिए।
अब तो आदत सी हो गई है इन ज़ख्मों की,
तेरा हर वार ज़ालिम अब मुस्कुरा कर सहते हैं।
हमने सोचा था तू बदलेगा एक दिन,
पर तू तो और भी ज़ालिम होता गया।
ये कैसी मोहब्बत है जिसमें सिर्फ़ दर्द है,
तेरी यादें ज़ालिम रात भर सोने नहीं देतीं।
नज़रें मिला कर वो हमसे दूर हो गया,
कैसा ज़ालिम था, जो दिल तोड़ कर चला गया।
हर ख़ुशी को मेरी उसने नज़रअंदाज़ किया,
क्या करें, वो ज़ालिम मेरी परवाह नहीं करता।
उसकी एक झलक के लिए तरसते रहे,
कितना ज़ालिम है वो जो हमें मिलने नहीं आता।
हमने दी उसे अपनी जान से भी ज़्यादा मुहब्बत,
फिर भी वो ज़ालिम हमें ठुकरा कर चला गया।
दिल में जो आग है, वो बुझाई नहीं जाती,
तेरी बेवफ़ाई ज़ालिम भुलायी नहीं जाती।
वो क्या जानेगा दर्द-ए-दिल की शिद्दत को,
जिसका दिल खुद इतना ज़ालिम है।
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर तूने आज़माया,
ऐ ज़ालिम, कब तक मेरे सब्र को सताएगा?
हमने चाहा था तुझे बेपनाह मोहब्बत से,
तूने दी हमें ज़ालिम जुदाई की सौगात।
किससे कहें अपने दिल का हाल हम,
ये ज़ालिम ज़माना किसी की नहीं सुनता।
तेरी यादों के साये में जीते हैं हम,
तेरा ज़ालिम चेहरा हर पल सामने रहता है।
न दिन को चैन, न रातों को करार,
तेरा इश्क़ ज़ालिम बन गया है मेरा यार।
शिकायत क्या करें हम तुझसे ए ज़ालिम,
जब अपनी किस्मत ही बेवफ़ा निकली।
मुस्कुरा कर वो हर बार ज़ख्म देते रहे,
हम भी ज़ालिम इश्क़ में सब सहते रहे।
खुदा से दुआ है कि कोई ऐसा न चाहे,
जिसका महबूब इतना ज़ालिम हो।
तूने तो खेल-खेल में दिल तोड़ दिया,
पर इस ज़ालिम दिल का क्या होगा?
दर्द की गहराई को कौन समझेगा,
जब ज़ालिम दुनिया ही बेपरवाह है।
वादा करके वो मुकर गया पल भर में,
ऐ ज़ालिम, इतनी बेवफ़ाई कहाँ से सीखी?
सजा दी है तूने हमें इस तरह से ज़ालिम,
कि हर सांस अब एक बोझ लगती है।
तेरी खुशियों के लिए खुद को भुला दिया,
फिर भी तू ज़ालिम हमसे खफ़ा ही रहा।
हर आहट पे तेरे आने का गुमां होता है,
तेरी यादों का ये ज़ालिम सिलसिला कभी रुकता ही नहीं।
अब तो अश्कों ने भी साथ छोड़ दिया,
तेरी बेरुखी ने ज़ालिम हमें पत्थर बना दिया।
किस कदर टूटे हैं हम तेरी मोहब्बत में,
ये ज़ालिम दिल अब किसी पर ऐतबार नहीं करता।
हमने दीवाने बनकर की तुमसे वफ़ा,
पर तू ज़ालिम निकला और सब कुछ लूट गया।
ये आग बुझती नहीं, ये प्यास मिटती नहीं,
तेरी यादों का ज़ालिम सिलसिला चलता ही रहता है।
कैसे भुला दूँ मैं उस ज़
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