Zulm (ज़ुल्म)
ज़ुल्म (Zulm) पर शानदार शायरी का संग्रह
ज़ुल्म की दास्तान
जब हर तरफ़ फैला हो अँधेरा, और ना हो कोई सवेरा,
तब जान लो कि ये है ज़ुल्म, जिसने घेरा.
दर्द-ए-इंसानियत
इंसानियत का चेहरा भी दागदार हो जाता है,
जब बेज़ुबानों पर ज़ुल्म का वार हो जाता है.
आँसू और ज़ुल्म
आँखों से गिरे आँसू, दरिया बन जाते हैं,
जब ज़ुल्म की हदें सारी पार कर जाते हैं.
ज़ुल्म की पुकार
हर रात ये दिल किसी से पुकारता है,
कब थमेगा ये ज़ुल्म, जो हमें मारता है.
खामोशी का बोझ
खामोशी भी एक ज़ुल्म है, जो सह रहे हैं हम,
अपनी आहों को अंदर ही दबा रहे हैं हम.
ज़ुल्म की आग
कब तक जलेगी ये आग ज़ुल्म की, बताओ तो सही,
कब बुझेगी ये प्यास, इंसाफ़ दिलाओ तो सही.
इंसाफ़ की आस
कोई तो हो जो इस ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाए,
कोई तो हो जो बेबसों को इंसाफ दिलाए.
जुल्मी की पहचान
जुल्मी की पहचान यही है, वो किसी का नहीं होता,
अंधे बनकर वो बस ज़ुल्म का बीज बोता.
बेबसी का आलम
इस बेबसी का आलम क्या बताएं तुम्हें,
हर मोड़ पर मिलता है, बस ज़ुल्म का ज़ख़्म हमें.
रूह की आवाज़
रूह चीख़ती है मगर आवाज़ नहीं आती,
इतना गहरा है ये ज़ुल्म, रोशनी नज़र नहीं आती.
टूटे हुए ख्वाब
कितने ख्वाब टूट गए, कितनी उम्मीदें बिखर गईं,
ये सब उस ज़ुल्म की देन है, जो ज़मीन पर उतरीं.
समय का वार
समय का चक्र जब बदलेगा, ज़ुल्म तेरा भी खत्म होगा,
हर जुल्मी को अपने कर्मों का फल ज़रूर मिलेगा.
दर्द की आहट
हर आहट में दर्द है, हर सांस में घुटन,
न जाने कब थमेगी, इस ज़ुल्म की चुभन.
अन्याय का राज
अन्याय का राज जब से फैला है हर ओर,
तब से ज़ुल्म की शमशीर ने कर दिया है सबको कमज़ोर.
आवाज़-ए-हक़
दबाना चाहा हर आवाज़ को, ये ज़ुल्म का काम है,
मगर सच की गूँज कभी नहीं रुकती, ये खुदा का पैगाम है.
ज़मीर की चीख
ज़मीर भी रोता है, जब ज़ुल्म हद से गुज़र जाए,
कौन संभालेगा फिर, जब कोई अपना बिछड़ जाए.