Sangdil (संगदिल)
अल्फ़ाज़-ए-दर्द:
संगदिल की कैफ़ियत पर दिलकश शायरी
शायरी 1
तेरी महफ़िल में अब कोई जगह नहीं मेरी,
जब से जाना तू कितना संगदिल है।
शायरी 2
अश्कों की बारिश भी उसे पिघला न सकी,
वो तो फ़ितरत से ही निकला संगदिल।
शायरी 3
हर ज़ख़्म पे मुस्कुराना सीख लिया हमने,
जब से जाना तू कितना संगदिल है।
शायरी 4
इश्क़ की राहों में धोखे ही मिले हैं हमें,
शायद दिल मेरा ही निकला संगदिल के क़ाबिल।
शायरी 5
मोहब्बत का दामन छोड़ दिया हमने,
जब देखा यार अपना कितना संगदिल है।
शायरी 6
शिकायतें लबों पर आकर मर जाती हैं,
क्या फ़ायदा, जब तू ही इतना संगदिल है।
शायरी 7
तेरी बेरुखी ने दिल को तोड़ दिया है,
मान लिया अब तू है सच में संगदिल।
शायरी 8
पत्थर का सनम नहीं, इंसान था वो,
फिर भी निकला क्यों इतना संगदिल वो।
शायरी 9
किस-किस को बताएं दर्द-ए-दिल अपना,
जब सुनने वाला ही निकला संगदिल।
शायरी 10
तेरी यादों में खोए रहते हैं रात-दिन,
पर तू है कि अब भी उतना ही संगदिल।
शायरी 11
कितना समझाया इस दिल को मैंने,
मत कर मोहब्बत, वो तो है संगदिल।
शायरी 12
वफ़ा की कसमें खाते थे कभी तुम भी,
अब क्यों बन गए हो इतने संगदिल।
शायरी 13
दिल के टुकड़े कर के भी चैन न आया तुम्हें,
ऐसी है तेरी फितरत, तू तो है संगदिल।
शायरी 14
हर रात चांदनी में तुम्हें ढूंढते हैं हम,
क्या करें, दिल को पता है तू संगदिल है।
शायरी 15
तेरी यादों से भी अब दूरी बना ली है,
तेरा तो काम ही था बस रहना संगदिल।
शायरी 16
ग़मों की बस्ती में ही अब रहता हूं मैं,
तेरी बेरुखी ने मुझको किया संगदिल।
शायरी 17
कितने वादे तोड़ दिए तुमने पल भर में,
फिर भी कहता है दिल, तू नहीं संगदिल।
शायरी 18
मेरे आँसुओं की कहानी कौन सुनेगा,
जब मेरा यार ही इतना संगदिल है।
शायरी 19
हर कोशिश की तुम्हें मनाने की मैंने,
पर तुम तो ठहरे, बिल्कुल ही संगदिल।
शायरी 20
क्या पता था मोहब्बत में ये भी दिन आएगा,
जब मेरा महबूब ही बन जाएगा संगदिल।
शायरी 21
मेरी तन्हाई का सबब भी तुम ही हो,
क्यूंकि तुम ही तो थे वो संगदिल।
शायरी 22
दिल की गहराइयों में दफ़्न है दर्द मेरा,
कौन समझेगा, तू तो ठहरा संगदिल।
शायरी 23
अब तो पत्थर भी पिघल जाते हैं अक्सर,
पर मेरा यार अब भी है उतना ही संगदिल।
शायरी 24
तेरी नज़रों में मेरे लिए प्यार नहीं,
बस एक संगदिल की हैवानियत भरी।
शायरी 25
मेरे जज़्बातों का तूने मज़ाक उड़ाया,
तू तो था ही अज़ल से इतना संगदिल।