Khafgi (ख़फ़गी)
ख़फ़गी (Khafgi): दिल की गहराइयों से निकलीं शायरियां
कुछ अनकही सी बातों में, है तेरी आज भी ख़फ़गी,
लबों पर हँसी मगर, आँखों में है आज भी उदासी।
मेरी हर बात पे वो, रूठ जाते हैं अक्सर,
कहाँ जाए ये दिल, जब प्यार में हो इतनी ख़फ़गी।
इश्क़ में इतना भी, खुदगर्ज ना बनो यारों,
के टूट जाए रिश्ते, बस एक छोटी सी ख़फ़गी से।
तेरी आँखों की गहराई में, एक अजीब सी बात है,
प्यार भी दिखता है, और छुपी है तेरी ख़फ़गी भी साथ है।
माना कि थोड़ी सी, नाराज़गी है तुमको हमसे,
मगर दूर ना जाना, इस छोटी सी ख़फ़गी के वास्ते।
किस बात की है ये, इतनी लंबी ख़फ़गी,
एक पल में खत्म कर दो, मेरी साँसों की गर्दगी।
हर बात पे गर, तूने ख़फ़गी दिखाई तो,
इश्क़ की राहें, यूँ ही अधूरी रह जाएंगी।
तेरी ख़फ़गी भी अब तो, प्यारी लगने लगी है,
कम से कम इसी बहाने, तू हमसे बात तो करती है।
ये दूरियाँ, ये फासले, ये तेरी ख़फ़गी,
कब तक सताएगी, कब तक चलेगी ये बेबसी।
लम्हों की इस भीड़ में, तेरी यादें भी गुम सी हैं,
और इस दिल में आज भी, बसी तेरी ख़फ़गी है।
अंदाज़े बयां बदल गए, पर बात वही है,
तेरी चुप्पी में आज भी, छुपी है वो ख़फ़गी।
गर चाहते हो कि, मैं तुम्हें मनाऊँ हर दफ़ा,
तो अपनी ख़फ़गी को, यूँ ही सज़ाओ हर दफ़ा।
वो ज़रा सी ख़फ़गी, और सदियों की दूरियाँ,
क्या यही है प्यार, या बस महज़ मजबूरियाँ।
दिल की बातें दिल में ही, रह जाती हैं अक्सर,
जब बीच में आ जाए, थोड़ी सी ख़फ़गी।
कभी तो समझो, इन खामोश निगाहों को,
इनमें छुपी है, मेरी बेपनाह ख़फ़गी।
इंतज़ार रहेगा, तुम्हारे लौट आने का,
जब टूट जाए, तुम्हारी ये ख़फ़गी का फ़साना।
मुझसे नाराज़गी तेरी, मुझे मंजूर है,
बस इतना बता दे, कब तक रहेगी ये ख़फ़गी।
अजीब है ये इश्क़ भी, कभी हँसाए, कभी रुलाए,
और बीच में कभी, ये ख़फ़गी के बादल छाए।
तुम्हारी ख़फ़गी भी एक अदा है, क्या खूब निभाते हो,
हर बार कुछ नया, सिखा जाते हो।
रिश्तों की डोर को, यूँ कमज़ोर ना करो,
छोटी सी ख़फ़गी से, उन्हें यूँ ना तोड़ो।
पल भर की ख़फ़गी, सदियों का इंतज़ार,
इश्क़ में इतना सबर, भी है कहाँ मेरे यार।
तेरी ख़फ़गी में भी, एक सुकून मिलता है,
कम से कम इसी बहाने, तू याद तो रहता है।
हर लफ्ज़ में तेरी, ख़फ़गी का रंग है,
फिर भी दिल को तेरे, प्यार की उमंग है।
ये कैसा रिश्ता है, हमारा और तुम्हारा,
कभी प्यार, कभी ख़फ़गी, कभी हर पल सहारा।
तेरी इस ख़फ़गी को, दूर कर ही लेंगे,
तेरे प्यार की कसम, तुझे अपना बना ही लेंगे।
नज़रें झुका के भी, तू बातें करती है,
तेरी ख़फ़गी में भी, एक अदा छलकी है।
ये चाँद भी गवाह है, मेरी बेकरारी का,
कब ख़त्म होगी, ये तुम्हारी ख़फ़गी का तराना।
दिल की हर धड़कन में, तेरा नाम है,
फिर क्यों तेरी आँखों में, ये ख़फ़गी का पैग़ाम है।
माना है मैंने, मेरी हर खता को,
अब तो खत्म कर दो, अपनी इस ख़फ़गी को।
ये मौसम भी बदला है, हवाओं का रुख़ भी बदला है,
कब बदलेगी ये तेरी, गहरी सी ख़फ़गी।
हर रात यही सोचता हूँ, क्या कहूँ तुमसे,
कि पिघल जाए तेरी, ये बेपनाह ख़फ़गी मुझसे।
तेरे एक मुस्कान को तरसे, ये निगाहें मेरी,
और तू सजाए बैठी है, दिल में ये ख़फ़गी गहरी।