Zulm (ज़ुल्म)
ज़ुल्म (Zulm) पर शानदार शायरी का संग्रह ज़ुल्म की दास्तान जब हर तरफ़ फैला हो अँधेरा, और ना हो कोई सवेरा, तब जान लो कि ये है ज़ुल्म , जिसने घेरा. दर्द-ए-इंसानियत इंसानियत का चेहरा भी दागदार हो जाता है, जब बेज़ुबानों पर ज़ुल्म का वार हो जाता है. आँसू और ज़ुल्म आँखों से गिरे आँसू, दरिया बन जाते हैं, जब ज़ुल्म की हदें सारी पार कर जाते हैं. ज़ुल्म की पुकार हर रात ये दिल किसी से पुकारता है, कब थमेगा ये ज़ुल्म , जो हमें मारता है. खामोशी का बोझ खामोशी भी एक ज़ुल्म है, जो सह रहे हैं हम, अपनी आहों को अंदर ही दबा रहे हैं हम. ज़ुल्म की आग कब तक जलेगी ये आग ज़ुल्म की, बताओ तो सही, ...