Reza (रेज़ा)
रेज़ा रेज़ा इश्क़: बिखरते एहसासों का सफर
तेरी यादों के टुकड़े आज भी बिखरे हैं,
दिल के हर रेज़ा में, तुम ही तो ठहरे हैं।
मोहब्बत काँच सी थी, टूटी जब ज़माने में,
हर एक रेज़ा चुभता है, अब इस फ़साने में।
खामोशी जब दिल में शोर मचाती है,
तो हर रेज़ा जुदा होकर बिखर जाता है।
ख्वाबों की दुनिया थी, पल भर में ढह गई,
हर इक रेज़ा में सिर्फ़ तेरी कमी रह गई।
टूटे हुए तारों से मांगी थी दुआ कभी,
आज दिल का हर रेज़ा वही कहानी कहता है।
जब बिखरे जज़्बात, तो संभाले नहीं संभले,
हर एक रेज़ा ने एक नया ग़म उछाला है।
ज़िंदगी के पन्नों से जब कुछ खो जाता है,
तो दिल का हर रेज़ा खामोश हो जाता है।
आसमाँ के टूटते सितारों सी थी मेरी हँसी,
अब हर रेज़ा में एक अश्क छुपा बैठा है।
वो वक़्त भी क्या था जब तू साथ था मेरे,
आज हर रेज़ा मुझे अकेला कर गया।
मिट्टी के ढेले सा था मेरा वजूद कभी,
तूने तो हर रेज़ा को बिखेर डाला है।
कोई कैसे समझे इस टूटे हुए दिल का दर्द,
जब हर रेज़ा में उसकी जुदाई का ज़हर है।
बिखरी हुई तस्वीरें समेटना मुश्किल है,
जब यादों का हर रेज़ा तुम्हें पुकारता है।
चाँद भी अधूरा है, मेरी रातें भी तन्हा,
और दिल का हर रेज़ा तुम्हें ही ढूँढता है।
खुशियों की बारिश में भीगने का मौका नहीं,
यहाँ ग़म का हर रेज़ा हमें तरसता है।
कागज़ की कश्ती थी, तूफ़ानों में घिर गई,
बिखर गई हर रेज़ा, कहाँ अब मिलेगी।
अधूरी कहानियाँ, अनकही बातें बहुत हैं,
हर रेज़ा में एक राज़, जो कभी खुलता नहीं।
इंतज़ार की हदें कब की पार कर चुके हैं,
अब तो साँस का हर रेज़ा तुम्हें याद करता है।
बिखरने का दर्द तो वो ही जानते हैं,
जिनका वजूद हर रेज़ा में टूट चुका हो।
मुश्किल है समेटना अब इन बिखरे लम्हों को,
हर एक रेज़ा तेरा नाम गुनगुनाता है।
अंधेरी रातों में चाँदनी कहाँ मिलती है,
मेरे दिल का हर रेज़ा तो उजाले का मोहताज है।
सपनों का महल था, एक पल में ढह गया,
अब हर रेज़ा उसकी यादों का सबूत है।
जब रिश्ते की डोर कच्ची निकली,
तो दिल का हर रेज़ा टूट कर बिखर गया।
अकेलेपन की चादर में लिपटे हुए हैं हम,
और हर रेज़ा तुम्हारी कमी का एहसास दिलाता है।
वो ज़ुल्फ़ों की छाँव, वो आँखों की मस्ती,
आज हर रेज़ा उन लम्हों का कैदी है।
जब तकदीर ने खेल ऐसे खेले,
खुशियों का हर रेज़ा गम में बदल गया।
बिखरने से पहले भी हम बिखरे हुए थे,
बस अब हर रेज़ा ज़ाहिर हो गया है।
दर्द की कहानी है, जो हर लब पर है,
मेरे दिल का हर रेज़ा उसी का हिस्सा है।
समंदर की गहराई में भी कहाँ सुकून मिला,
जब मेरे दिल का हर रेज़ा तड़प रहा था।
धूल की मानिंद उड़े हम हवाओं में,
और हर रेज़ा में सिर्फ़ तेरा नाम रह गया।
कभी सोचा न था, ऐसे बिखर जायेंगे,
के हर रेज़ा भी जुदा सा लगने लगेगा।
रात भर जागकर लिखते रहे जो दास्तान,
आज उसका हर रेज़ा सिर्फ़ आँसुओं से धुला है।
टूटे हुए दर्पण में अक्स कहाँ दिखता है,
मेरे दिल का हर रेज़ा भी कुछ ऐसा ही है।
खुशियों की तलाश में भटकते रहे उमर भर,
और हाथ आया ग़म का हर रेज़ा ही।
रिश्तों की दीवारें जब टूटती हैं,
तो हर रेज़ा गहरा ज़ख्म दे जाता है।
बेबसी का आलम क्या पूछते हो,
मेरा हर रेज़ा किसी के हाथ की रेत है।
इश्क़ की गलियों में भटकते रहे उम्र भर,
और मिला बस दिल का हर रेज़ा बिखरा हुआ।
गर्दिश-ए-अय्याम ने ऐसे घेरा है,
कि मेरे वजूद का हर रेज़ा खामोश है।
हर रात, सितारे जब टूट कर गिरते हैं,
लगता है दिल का हर रेज़ा मुझसे बिछड़ता है।
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